waqif kahaan zamaana hamaari udaan se | वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से

  - Faheem Jogapuri

वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से
वो और थे जो हार गए आसमान से

  - Faheem Jogapuri

Motivational Shayari in Hindi

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    दोस्ती में न दुश्मनी में हम
    क्या नज़र आएँगे किसी में हम

    क्यूँ सजाते हैं ख़्वाब सदियों के
    चंद लम्हों की ज़िंदगी में हम

    सैर करते हैं दोनों आलम की
    अपने ख़्वाबों की पालकी में हम

    जब तुम्हारा ख़याल आता है
    डूब जाते हैं रौशनी में हम

    कोई आवाज़ क्यूँ नहीं देता
    डगमगाते हैं तीरगी में हम

    प्यास हम को कहीं सताती है
    तैरते हैं कहीं नदी में हम

    रात होती तो कोई बात न थी
    लुट गए दिन की रौशनी में हम

    अपने माज़ी से बात करते हैं
    तेरी यादों की चाँदनी में हम
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    Faheem Jogapuri
    जिस ने छुपा के भूक को पत्थर में रख लिया
    दुनिया को इस फ़क़ीर ने ठोकर में रख लिया

    अहल-ए-जुनूँ को अपने जुनूँ से वो इश्क़ था
    दिल ने जगह न दी तो उसे सर में रख लिया

    नन्हा कोई परिंद उड़ा जब तो यूँ लगा
    हिम्मत ने आसमान को शहपर में रख लिया

    आँखों ने आँसुओं को अजब एहतिमाम से
    मोती बना के दिल के समुंदर में रख लिया

    हम ने तुम्हारी दीद के लम्हे समेट कर
    फिर से पुराने ख़्वाब की चादर में रख लिया

    क्या डर समा गया कि हमारे हरीफ़ ने
    तुम जैसे शहसवार को लश्कर में रख लिया

    कुछ बात थी जो हम ने सितारों के दरमियाँ
    उन आँसुओं को रात के मंज़र में रख लिया

    आँखें थकीं तो दिल ने सहारा दिया 'फहीम'
    हम ने किसी का अक्स नए घर में रख लिया
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    Faheem Jogapuri
    शाम ख़ामोश है पेड़ों पे उजाला कम है
    लौट आए हैं सभी एक परिंदा कम है

    देख कर सूख गया कैसे बदन का पानी
    मैं न कहता था मिरी प्यास से दरिया कम है

    ख़ुद से मिलने की कभी गाँव में फ़ुर्सत न मिली
    शहर आए हैं यहाँ मिलना-मिलाना कम है

    आज क्यूँ आँखों में पहले से नहीं हैं आँसू
    आज क्या बात है क्यूँ मौज में दरिया कम है

    अपने मेहमान को पलकों पे बिठा लेती है
    मुफ़्लिसी जानती है घर मैं बिछौना कम है

    बस यही सोच के करने लगे हिजरत आँसू
    अपनी लाशों के मुक़ाबिल यहाँ कांधा कम है

    दिल की हर बात ज़बाँ पर नहीं आती है 'फहीम'
    मैं ने सोचा है ज़ियादा उसे लिक्खा कम है
    Read Full
    Faheem Jogapuri
    आना था जिसे आज वो आया तो नहीं है
    ये वक़्त बदलने का इशारा तो नहीं है

    दावत दे कभी क्यूँ वो मोहब्बत से बुलाए
    दरिया से मिरी प्यास का रिश्ता तो नहीं है

    ये कौन गया है कि झपकती नहीं आँखें
    रस्ते में वो ठहरा हुआ लम्हा तो नहीं है

    हँसता हुआ चेहरा है दमकता हुआ पैकर
    गुज़रा हुआ ये मेरा ज़माना तो नहीं है

    आँखों ने अभी नींद का दामन नहीं छोड़ा
    ख़्वाबों से भरोसा अभी टूटा तो नहीं है

    दरिया में सर-ए-शाम है डूबा हुआ सूरज
    दिन-भर का मुसाफ़िर कोई प्यासा तो नहीं है

    छोड़ आए हो जिस के लिए आँचल की घनी छाँव
    इस शहर में वो धूप का टुकड़ा तो नहीं है

    रस्ते में 'फहीम' उस की तबीअ'त का बिगड़ना
    घर जाने का इक और बहाना तो नहीं है
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    Faheem Jogapuri
    अपने क़दम की चाप से यूँ डर रहे हैं हम
    मक़्तल की सम्त जैसे सफ़र कर रहे हैं हम

    क्या चाँद और तारों को हम जानते नहीं
    ऐ आसमान वालो ज़मीं पर रहे हैं हम

    मुश्किल था सत्ह-ए-आब से हम को खंगालना
    बाहर नहीं थे जितना कि अंदर रहे हैं हम

    कल और कोई वक़्त की आँखों में हो तो क्या
    अब तक तो हर निगाह का मेहवर रहे हैं हम

    दैर-ओ-हरम से और भी आगे निकल गए
    हाँ अक़्ल की हुदूद से बाहर रहे हैं हम

    ऐ हम-सफ़र न पूछ मसाफ़त नसीब से
    तू जानता है कितने दिनों घर रहे हैं हम

    बाहर न आए हम भी अना के हिसार से
    इस जंग में तुम्हारे बराबर रहे हैं हम

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    दरिया गिरे जहाँ वो समुंदर रहे हैं हम
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    Faheem Jogapuri

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