Faheem Jogapuri

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Faheem Jogapuri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Faheem Jogapuri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से वो और थे जो हार गए आसमान से — Faheem Jogapuri

Ghazal

अपने क़दम की चाप से यूँँ डर रहे हैं हम मक़्तल की सम्त जैसे सफ़र कर रहे हैं हम क्या चाँद और तारों को हम जानते नहीं ऐ आसमान वालो ज़मीं पर रहे हैं हम मुश्किल था सत्ह-ए-आब से हम को खंगालना बाहर नहीं थे जितना कि अंदर रहे हैं हम कल और कोई वक़्त की आँखों में हो तो क्या अब तक तो हर निगाह का मेहवर रहे हैं हम दैर-ओ-हरम से और भी आगे निकल गए हाँ अक़्ल की हुदूद से बाहर रहे हैं हम ऐ हम-सफ़र न पूछ मसाफ़त नसीब से तू जानता है कितने दिनों घर रहे हैं हम बाहर न आए हम भी अना के हिसार से इस जंग में तुम्हारे बराबर रहे हैं हम झरनों की क्या बिसात करें गुफ़्तुगू 'फहीम' दरिया गिरे जहाँ वो समुंदर रहे हैं हम — Faheem Jogapuri
जिस ने छुपा के भूक को पत्थर में रख लिया दुनिया को इस फ़क़ीर ने ठोकर में रख लिया अहल-ए-जुनूँ को अपने जुनूँ से वो इश्क़ था दिल ने जगह न दी तो उसे सर में रख लिया नन्हा कोई परिंद उड़ा जब तो यूँँ लगा हिम्मत ने आसमान को शहपर में रख लिया आँखों ने आँसुओं को अजब एहतिमाम से मोती बना के दिल के समुंदर में रख लिया हम ने तुम्हारी दीद के लम्हे समेट कर फिर से पुराने ख़्वाब की चादर में रख लिया क्या डर समा गया कि हमारे हरीफ़ ने तुम जैसे शहसवार को लश्कर में रख लिया कुछ बात थी जो हम ने सितारों के दरमियाँ उन आँसुओं को रात के मंज़र में रख लिया आँखें थकीं तो दिल ने सहारा दिया 'फहीम' हम ने किसी का अक्स नए घर में रख लिया — Faheem Jogapuri
ग़म भी सदियों से हैं और दीदा-ए-तर सदियों से ख़ाना-बर्बादों के आबाद हैं घर सदियों से दर-ब-दर उन का भटकना तो नई बात नहीं चाहने वाले तो हैं ख़ाक-बसर सदियों से कोई मुश्किल न मसाफ़त है न रस्ते की थकन अस्ल ज़ंजीर है सामान-ए-सफ़र सदियों से तुझ से मिलने के सिवा सारी दुआएँ गुलशन इक यही शाख़ है बे-बर्ग-ओ-समर सदियों से क्या मुसाफ़िर हैं ये रस्ते में भटकने वाले जैसे बे-सम्त घटाओं का सफ़र सदियों से किस ने देखी है ज़माने में वफ़ा की ख़ुश्बू ये कहानी है किताबों में मगर सदियों से हर ज़माने में ख़ुशामद ने सदारत की है कामराँ होता रहा है ये हुनर सदियों से मा-सिवा हुस्न कहीं इश्क़ ने देखा न 'फहीम' एक ही सम्त को जामिद है नज़र सदियों से — Faheem Jogapuri
क्या कोई तस्वीर बन सकती है सूरत के बग़ैर फिर किसी से क्यूँँ मिले कोई ज़रूरत के बग़ैर दुश्मनी तो चाहने की इंतिहा का नाम है ये कहानी भी अधूरी है मोहब्बत के बग़ैर तेरी यादें हो गईं जैसे मुक़द्दस आयतें चैन आता ही नहीं दिल को तिलावत के बग़ैर धूप की हर साँस गिनते शाम तक जो आ गए छाँव में वो क्या जिएँ जीने की आदत के बग़ैर बच गया दामन अगर मेरे लहू के दाग़ से वो मिरा क़ातिल तो मर जाएगा शोहरत के बग़ैर उस की सरदारी से अब इनकार करना चाहिए रौशनी देता नहीं सूरज सियासत के बग़ैर हुस्न की दूकान हो कि इश्क़ का बाज़ार हो याँ कोई सौदा नहीं है दिल की दौलत के बग़ैर शबनमी चेहरा छुपाऊँ कैसे बच्चों से 'फहीम' शाम आती ही नहीं घर में तहारत के बग़ैर — Faheem Jogapuri
ये फ़क़ीरी है क़नाअ'त के सिवा क्या जाने कौन क्या दे के गया दस्त-ए-दुआ' क्या जाने आग तन में तो लगा लेना कोई खेल है क्या कितने मजबूर दिए होंगे हवा क्या जाने उस को करना है तह-ए-ख़ाक सो करती जाए कौन है सीम-बदन मौज-ए-बला क्या जाने वो तो दरियाओं को सैराब किए जाती है सूखे खेतों की ज़रूरत को घटा क्या जाने अश्क आँखों में भरे हों तो नज़ारा कैसा काँपता हाथ कोई बंद-ए-क़बा क्या जाने कोई ज़िंदा न बचे वो तो यही चाहते हैं कितना सुनता है ख़ुदाओं का ख़ुदा क्या जाने उस से पहले जो कभी चूमते फूलों को 'फहीम' कौन सा ग़म है हमें बाद-ए-सबा क्या जाने — Faheem Jogapuri
आना था जिसे आज वो आया तो नहीं है ये वक़्त बदलने का इशारा तो नहीं है दावत दे कभी क्यूँँ वो मोहब्बत से बुलाए दरिया से मिरी प्यास का रिश्ता तो नहीं है ये कौन गया है कि झपकती नहीं आँखें रस्ते में वो ठहरा हुआ लम्हा तो नहीं है हँसता हुआ चेहरा है दमकता हुआ पैकर गुज़रा हुआ ये मेरा ज़माना तो नहीं है आँखों ने अभी नींद का दामन नहीं छोड़ा ख़्वाबों से भरोसा अभी टूटा तो नहीं है दरिया में सर-ए-शाम है डूबा हुआ सूरज दिन-भर का मुसाफ़िर कोई प्यासा तो नहीं है छोड़ आए हो जिस के लिए आँचल की घनी छाँव इस शहर में वो धूप का टुकड़ा तो नहीं है रस्ते में 'फहीम' उस की तबीअ'त का बिगड़ना घर जाने का इक और बहाना तो नहीं है — Faheem Jogapuri
शाम ख़ामोश है पेड़ों पे उजाला कम है लौट आए हैं सभी एक परिंदा कम है देख कर सूख गया कैसे बदन का पानी मैं न कहता था मिरी प्यास से दरिया कम है ख़ुद से मिलने की कभी गाँव में फ़ुर्सत न मिली शहर आए हैं यहाँ मिलना-मिलाना कम है आज क्यूँँ आँखों में पहले से नहीं हैं आँसू आज क्या बात है क्यूँँ मौज में दरिया कम है अपने मेहमान को पलकों पे बिठा लेती है मुफ़्लिसी जानती है घर मैं बिछौना कम है बस यही सोच के करने लगे हिजरत आँसू अपनी लाशों के मुक़ाबिल यहाँ कांधा कम है दिल की हर बात ज़बाँ पर नहीं आती है 'फहीम' मैं ने सोचा है ज़ियादा उसे लिक्खा कम है — Faheem Jogapuri