Shayra kirti

Shayra kirti

@khamosh_ahsas

kirti shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in kirti's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

पहले ले कर नाम तेरा लड़ती थी, अब चुप रहती है जब भी कोई कहता है सब मर्द इक जैसे होते हैं — Shayra kirti
चुप अगर रहने लगे औरत कोई जान लेना खो चुके हो तुम उसे — Shayra kirti
उस ने अपनी पिक के नीचे डाले हैं दो लाल दिल और हर कोई ये चल रहा है मानकर, उस के लिए है — Shayra kirti
किसी से कर मुहब्बत तो अता कुछ इस अदा से कर हो अगले को ये हैरानी भला मुझ में है ऐसा क्या ? — Shayra kirti
जुदाई का असर होता है कुछ दिन बा'द में आ कर बिछड़ कर शाख़ से इकदम नहीं ये फूल मुरझाते — Shayra kirti
कितने सालों तक तेरी इस बात का भी एतबार किया एक ही वक़्त में दो लोगों से प्यार का होना मुमकिन है — Shayra kirti
तू भले न बात कर मुझ सेे कोई मसला नहीं शर्त है करता रहे मुझ सेे कोई बातें तेरी — Shayra kirti
मेरी तो तस्वीर भी बोला करती है तेरे दिल को कान नहीं है क्या कीजे — Shayra kirti
दो भाईयों के आपसी झगड़े में सदा माँ की ही होती है दुर्दशा — Shayra kirti
एक क़सम है उस की उस को फ़ोन नहीं करना एक मुसीबत ये वो नंबर भूल नहीं पाते — Shayra kirti
झूठ कहते आदमी को क्या पता है बे-वफ़ाई सूँघ सकती है इक औरत — Shayra kirti
अच्छा हो या लाख बुरा हो पर किरदार का सच्चा हो हम को बस तकलीफ़ रही है रंग बदलते लोगों से — Shayra kirti
उदास आँखों में मत झाँका कर ए ख़ुश आरज़ू लड़के उदासी फैलती है आँख के रस्ते से समझा कर — Shayra kirti
तो क्या था गर तुम्हारे वास्ते हम मर चुके हैं जनम-दिन पर तुम्हें इक फ़ोन करना चाहिए था — Shayra kirti
कहते हो तुम शादी रीत मिलन की है तो फिर इस की पहली शर्त विदाई क्यूँ — Shayra kirti
लाख़ यार दोस्त ज़िंदगी में लीजिये कमा जूझना अकेले है उदासियों के दौर से — Shayra kirti
नम आँखें भी नहीं होती के फ़ौरन फ़ोन बजता है मुझे उस की ज़रूरत है ये दीदी जान लेती है — Shayra kirti
तेरे बा'द देख तो सभी ने घर बसा लिए कोई भी मरा नहीं है कितनों की तू जान था — Shayra kirti
नहीं तुम को मुयस्सर खुल के रोना भी कहो ना यार फिर क्या ख़ाक ख़ुश हो तुम — Shayra kirti

Ghazal

क्यूँँ भागे मंज़िल की हवस में चल लंबे रस्ते से चल दुनिया बेशक दौड़ रही हो पर तू धीमे धीमे चल क्या बोलेंगे चार फ़लाने पेश-ओ-पस ताने-बाने इतने बोझ से थक जाएगा ले कर हल्के बस्ते चल बैठे बैठे हाँप रहा है भाँप रहा कल का संकट कहाँ किसी ने कल देखा है भोले नाथ भरोसे चल लगन में तेरी धार है इतनी पर्वत भी कट सकते हैं अपने आप बनेंगे रस्ते अपनी धुन में चलते चल कंकड़ पत्थर जोड़ रहा है कल इक महल बनाऊँगा महल के शाने ढह जाने हैं दोस्त दिलों में बसते चल नए मुसाफ़िर तुझे मुबारक हाथ छुड़ा जाने वाले कोई पीछे छूट रहा है थोड़ा मुड़ते-मुड़ते चल — Shayra kirti
इश्क़ के हर ज़ाविये को आज़माना चाहती हूँ उम्र भर लिख कर के ग़ज़लें गुनगुनाना चाहती हूँ आँख से उस की हर इक मोती चुराना चाहती हूँ और सभी मुस्कान पर उस की सजाना चाहती हूँ वो मेरी ख़ातिर ये दुनिया जीत लाना चाहता है और मैं उस के सदके दुनिया हार जाना चाहती हूँ वो मेरे सब नाज़ पलकों पर उठाना जानता है मैं बलाएँ उस की अपने सिर उठाना चाहती हूँ चाहता है वो हमारा इश्क़ दुनिया याद रक्खे मैं हमारे इश्क़ में हर शय भुलाना चाहती हूँ उस को मुझ ऐसी सयानी और भी मिल जाएँगी पर मैं तो हर सूरत फ़क़त वो ही दिवाना चाहती हूँ छोड़ सोलह सोमवार इस बार मैं चौसठ रखूँगी जन्म जन्मों तक उसे अपना बनाना चाहती हूँ — Shayra kirti
बराबर जी लगाती है भले ही जान लेती है असल जीना सिखा कर के उदासी जान लेती है वो लड़की इश्क़ है वो रंज है शाफ़ी है क़ातिल है वो लड़की जान है मेरी वो लड़की जान लेती है क़ुबूली है जिन्होंने ख़ुद ख़ुशी से अपनी बीमारी हक़ीम ऐसे मरीज़ों की दवा ही जान लेती है नम आँखें भी नहीं होती के फ़ौरन फ़ोन बजता है मुझे उस की ज़रूरत है ये दीदी जान लेती है किसे जलना है सारी रात किस को गीत लिखने हैं बुझाना भी किसे कब है उदासी जान लेती है समझते थे वो दे दे ज़ख़्म 'कीर्ति' को मिटा देंगे अब अपने घाव लिख लिख कर वो उन की जान लेती है — Shayra kirti
सभी के ही लिए जब घर खुला है आसमानों में हमीं क्यूँँ फ़र्क करते हैं परिंदों की उड़ानों में हमारे खा गई लड़के कमाई नौकरी और छत हमारी लड़कियाँ है दफ़्न इन छत की ढलानों में न कोई राय हो ने मत बिछी रहती हो नतमस्तक हो कुछ तो फ़र्क घरवाली व घर के पाएदानों में जिन्हें मंज़ूर होती है वफ़ा की खुरदरी रोटी वो जबरन ब्याह दी जाती है ऊँचे ख़ानदानों में जो मन को मार लेगी बस वही देवी वही सीता बड़ा सत्कार मुर्दों का तुम्हारे क़त्लख़ानों में हर इक लड़की के पीछे हैं कम अज़ कम चार छह मजनूँ न होकर भी वो होगी बे-वफ़ा कुछ इक फ़सानों में — Shayra kirti
ये फ़िक्र और ये देखभाल उन को जलाने के लिए हाए हमारा इस्तिमाल उन को जलाने के लिए और हर पुराने को सबक़ देना ज़रूरी हो गया लो फिर नया बकरा हलाल उन को जलाने के लिए वो आ लगे सीने हमारे और नज़र थी ग़ैर पर पूछा गया था हाल-चाल उन को जलाने के लिए जी उन की तस्वीरों तले आशिक़ हैं लिखते शा'इरी और दिल की ईमो लाल-लाल उन को जलाने के लिए अब इश्क़ के खंडर में बस शिकवों का मलबा रह गया इक याद है और है मलाल उन को जलाने के लिए जी भी जला जाँ भी जली जल के तकब्बुर ख़ाक है इक शौक़ में दिल पायमाल उन को जलाने के लिए अब हर तरह से कीर्ती करना पड़ेगा सब्र ही तू शुक्र कर या कर मलाल उन को जलाने के लिए — Shayra kirti
रोज़ बिखरते इन की माँग के मोती हैं शायद के धागों में रोज़ पिरोती हैं दान मिली गायों से जब तक दूध मिले तब तक ही आँगन की शोभा होती हैं क़त्लों से याँ धर्म बचाए जाते हैं कपड़ों से याँ मर्यादाएँ खोती हैं हाँक रहे थे जो वो थक कर बैठ गए ढोने की आदत को पीठें ढोती हैं उन औलादों का नाभी अमृत सूख चुका माएँ जिन की माँ होने पर रोती हैं अपनी चुप्पी साफ़ सुनाई देती है कुछ रातें तो इतनी तन्हा होती हैं मेरे छोटे क़द पर बिल्कुल मत जाना सँकरी नदियाँ अक्सर गहरी होती हैं कीर्ति तू अंदाज़ बिगाड़े बैठी है ग़ज़लें इतनी कड़वी थोड़ी होती हैं — Shayra kirti