क्यूँँ भागे मंज़िल की हवस में चल लंबे रस्ते से चल
दुनिया बेशक दौड़ रही हो पर तू धी
में धी
में चल
क्या बोलेंगे चार फ़लाने पेश-ओ-पस ताने-बाने
इतने बोझ से थक जाएगा लेकर हल्के बस्ते चल
बैठे बैठे हाँप रहा है भाँप रहा कल का संकट
कहाँ किसी ने कल देखा है भोले नाथ भरोसे चल
लगन में तेरी धार है इतनी पर्वत भी कट सकते हैं
अपने आप बनेंगे रस्ते अपनी धुन में चलते चल
कंकड़ पत्थर जोड़ रहा है कल इक महल बनाऊँगा
महल के शाने ढह जाने हैं दोस्त दिलों में बसते चल
नये मुसाफ़िर तुझे मुबारक हाथ छुड़ा जाने वाले
कोई पीछे छूट रहा है थोड़ा मुड़ते-मुड़ते चल
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