roz bikharte inki maang ke moti hain | रोज़ बिखरते इनकी माँग के मोती हैं

  - Shayra kirti

रोज़ बिखरते इनकी माँग के मोती हैं
शायद के धागों में रोज़ पिरोती हैं

दान मिली गायों से जब तक दूध मिले
तब तक ही आँगन की शोभा होती हैं

क़त्लों से याँ धर्म बचाए जाते हैं
कपड़ों से याँ मर्यादाएँ खोती हैं

हाँक रहे थे जो वो थक कर बैठ गये
ढोने की आदत को पीठें ढोती हैं

उन औलादों का नाभी अमृत सूख चुका
माएँ जिनकी माँ होने पर रोती हैं

अपनी चुप्पी साफ़ सुनाई देती है
कुछ रातें तो इतनी तन्हा होती हैं

मेरे छोटे क़द पर बिल्कुल मत जाना
सँकरी नदियाँ अक्सर गहरी होती हैं

कीर्ति तू अंदाज़ बिगाड़े बैठी है
ग़ज़लें इतनी कड़वी थोड़ी होती हैं

  - Shayra kirti

Muflisi Shayari

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