उलझे पड़े हैं बीछिये भी फाल में
फिर से नमक ज़्यादा हुआ है दाल में
सर पैर तक डूबी हुई इक सोच में
क्या क्या पकाती ज़ेहन के भूचाल में
मुस्कान उसकी खा गईं तनहाइयाँ
डिंपल पड़ा करते थे उसके गाल में
अल्हड़ नदी शालीन कितनी हो गई
बदलाव कैसा आ गया उस चाल में
क्यूँ बाप की बिगड़ी हुई शहज़ादियाँ
गुमसुम सी रहने लग गईं ससुराल में
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