'इश्क़ के हर ज़ाविये को आज़माना चाहती हूँ
'उम्र भर लिख कर के ग़ज़लें गुनगुनाना चाहती हूँ
आँख से उसकी हर इक मोती चुराना चाहती हूँ
और सभी मुस्कान पर उसकी सजाना चाहती हूँ
वो मेरी ख़ातिर ये दुनिया जीत लाना चाहता है
और मैं उसके सदके दुनिया हार जाना चाहती हूँ
वो मेरे सब नाज़ पलकों पर उठाना जानता है
मैं बलाएँ उसकी अपने सिर उठाना चाहती हूँ
चाहता है वो हमारा 'इश्क़ दुनिया याद रक्खे
मैं हमारे 'इश्क़ में हर शय भुलाना चाहती हूँ
उसको मुझ ऐसी सयानी और भी मिल जाएँगी पर
मैं तो हर सूरत फ़क़त वो ही दिवाना चाहती हूँ
छोड़ सोलह सोमवार इस बार मैं चौसठ रखूँगी
जन्म जन्मों तक उसे अपना बनाना चाहती हूँ
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