Shayra kirti

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    झूठ कहते आदमी को क्या पता है
    बेवफ़ाई सूँघ सकती है इक औरत

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    चुप अगर रहने लगे औरत कोई
    जान लेना खो चुके हो तुम उसे

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    उसने अपनी पिक के नीचे डाले हैं दो लाल दिल और
    हर कोई ये चल रहा है मानकर, उसके लिए है

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    मुस्कुरा रहे हैं आप दोस्त आप कौन हैं
    चाह क्या रहे हैं आप दोस्त आप कौन हैं

    हम हज़ीं हैं मुब्तिला इबादत-ए-फ़िराक़ में
    आज़मा रहें हैं आप दोस्त आप कौन हैं

    हम दुकान बंद कर चुके हैं इश्क़ की जनाब
    खटखटा रहें हैं आप दोस्त आप कौन हैं

    ज़ख़्म वो जो जिस्म हो चुके हैं रिसते रिसते अब
    देख पा रहे हैं आप दोस्त आप कौन हैं

    सात साल जान-माल लेके पूछते हैं वो
    जान खा रहे हैं आप दोस्त आप कौन हैं

    बाग में मेरे मेरी ही नाक के तले ग़ज़ब
    गुल खिला रहे हैं आप दोस्त आप कौन हैं

    बज़्म में वफ़ा जफ़ा दग़ा हया की बात है
    तिलमिला रहे हैं आप दोस्त आप कौन हैं

    बार-बार बात-बात में उसी अज़ीज़ का
    नाम ला रहे हैं आप दोस्त आप कौन हैं

    लोग-बाग पूछते हैं पढ़ के तुझको कीर्ति
    जी जला रहें हैं आप दोस्त आप कौन हैं

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    नहीं मानेंगे घरवाले ये कहकर था मुझे छोड़ा
    फिर उसके बाद में उसने किसी से करली लव मैरिज

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    बहुत आसान रखते हैं मुहब्बत को नए मजनूँ
    नसों को काट लेते हैं नशों में डूब जाते हैं

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    कभी ये भी नहीं पूछा है गर्दन पे निशाँ कैसा
    हमें अंधी मोहब्बत थी हमें अंधा भरोसा था

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    मिला उस शख़्स से हमको फक़त धोखा ही धोखा था
    मगर फिर भी कभी हमने उसे रोका न टोका था

    कभी ये भी नहीं पूछा है गर्दन पे निशाँ कैसा
    हमें अंधी मोहब्बत थी हमें अंधा भरोसा था

    इधर था सौत का साया उधर थे हिज़्र के बादल
    हमें ऐसे भी मरना था हमें वैसे भी मरना था

    हमें उससे मुहब्बत थी उसे इसका तकाज़ा था
    न होते भी हुए रिश्ता ये बिल्कुल एकतरफा था

    तुम्हीं ने कीर्ति दिल में ठगों को दे दिया दर्जा
    तुम्हारी चाह में वरना एक से एक लड़का था

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    औरत की ताक़त पर जानाँ शक नइ करते
    पत्थर पिघला देती है सीने से लगाकर

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    नाम उनका गैरों से यूँ जोड़ कर के देखना
    क्या भला भाता है तुझको रोज़ मर के देखना

    दिल मेरे मुझको बता क्या मर्ज़ है आख़िर तुझे
    आँख में चुभते हुए को आँख भर के देखना

    है दुआ तुमको मिले तुमसा ही कोई रहगुज़र
    मुझपे जो गुज़री है तुम उससे गुज़र के देखना

    अब उन्हें अफ़सोस हो के क्या गया है हाथ से
    आइने में मेरा ख़ुद को बन सँवर के देखना

    मुड़ रहा है देखने को देखकर फ़िर मुड़ रहा
    देखकर कुछ सोचना कुछ सोच कर के देखना

    लाश के कानों में वो ये कह गया था कीर्ति
    प्यार में जीना हो तो फ़िर रोज़ मर के देखना

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