हार कर लौटे मुसाफ़िर कहिए क्या सत्कार दें
हो नया आगाज़ या वो ही पुराना प्यार दें
और कहिए आज़माइश दुनिया की कैसी रही
क्या मिले ऐसे भी कुछ जो हम सेे बढ़कर प्यार दें
जान-ओ-दिल खाएँगे या फिर पहले पीने को जनाब
हिज़्र में जोड़े गए नम आँसुओं का खार दें
बे-वफ़ाई दिल दुखाना ये तो अदने ज़ुल्म हैं
और गिरिए गिरने को इक बरतरी मेयार दें
आप ही से इल्तिज़ा है लौट कर मत आइए
हम
में तो हिम्मत नहीं के आपको दुत्कार दें
आज बेहद ग़ौर से इस कीर्ति को देखिए
और पहले वाली अपने ज़हन-ओ-दिल में मार दें
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