Muntazir Firozabadi

Muntazir Firozabadi

@muntazirfirozabadi2345

Muntazir Firozabadi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Muntazir Firozabadi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जिस्म पर अब भी निशांँ हैं सब बराबर लुत्फ़ के ज़ख़्म भी कितने हसीं मैं ने दिए दिलदार को — Muntazir Firozabadi
इतनी भी क्या जल्दी है मेरी मूरत बनवाने की थोड़ा सा तो वक़्त लगेगा ख़ुद पत्थर हो जाने में — Muntazir Firozabadi
बाहर की बातों को घर के अंदर कौन है लाया घर के लोगों का भी तो बाहर जाना रहता है — Muntazir Firozabadi
मुहब्बत के समुंदर की कलाकारी ग़ज़ब की है कि सब कुछ डूब जाता है मगर तर कुछ नहीं होता — Muntazir Firozabadi
इक दूजे की कि़स्मत थे हम इक दूजे से हार गए मुश्किल तो अब ये लगता है पहले किस पर रोएँ हम — Muntazir Firozabadi
ठहर भी जाओ मत उतरो तुम बा'द में फिर पछताओगे मैं दरिया हूँ मुझ को केवल प्यास बुझाना आता है — Muntazir Firozabadi
उस को था शौक बीच समुंदर में मरने का साहिल को खींच खींच के लाना पड़ा मुझे — Muntazir Firozabadi

Ghazal

जो मुझ से दूर जाना चाहता था वो मेरे साथ ही पकड़ा गया था मैं अपनी मुट्ठियों में क़ैद था या मुझे ऐसा किसी ने कर दिया था मिरी आँखें तो मैं ने नोच लीं थीं मुझे फिर भी किसी ने पढ़ लिया था बिछड़ते वक़्त भी दिल कुछ न बोला ये पागल ज़ब्त कर के रह गया था था उस से इश्क़ का इज़हार करना मुझे कुछ और ही कहना पड़ा था उसे मुझ से रिहाई चाहिए थी मैं अपनी लाश पर बैठा हुआ था कहा दोनों ने इक दूजे को बेहतर बस उस के बा'द झगड़ा हो गया था जहाँ के तब्सिरे से तंग आ कर बहुत नुक़सान हम ने कर लिया था सितारे बढ़ रहे थे मेरी जानिब मगर वो चाँद क्यूँँ ठहरा हुआ था मिरे यारो तुम्हारी ही बदौलत सफ़र जारी हुआ है, रुक गया था कभी आवाज़ दी थी 'मुंतज़िर' को मैं अपने आप से टकरा गया था — Muntazir Firozabadi
काश कि जो पहचाना होता अपनों को बेगानों को अश्कों से फिर थोड़े ही भरते अपने ही पैमानों को मेरे दिल को सब ने समझा एक किराए का कमरा जाने कितने ज़ख़्म दिए थे मैं ने भी मेहमानों को फूल सा नाज़ुक रिश्ता था वो अब तुम उस को जाने दो काँटों से भर रक्खा था हम ने अपने गुल-दानों को सारे घर की रौनक़ था जो वो भी हम को छोड़ गया क्यूँ गाली देते रहते हैं कमरों को दालानों को अब जब आगे ही बढ़ना है मिट्टी डालें ख़त्म करें आख़िर कब तक ढोएँगे हम इन प्यारे अफ़्सानों को कश्ती जब हो बीच सफ़र में इश्क़ समुंदर सहरा क्या मंज़िल की जानिब अब देखो छोड़ो भी तूफ़ानों को तहज़ीबें तो ये कहती हैं वस्ल की ख़ातिर ज़ब्त करो ज़ब्त से होता क्या ही हासिल मार दिया अरमानों को जन्नत में भी दोज़ख़ का ही सोग मनाते रहते हैं ख़ुशियाँ रास नहीं आतीं हैं हम जैसे इंसानों को क़त्ल न होगा तुम से मेरा मैं अपना ही दुश्मन हूँ आग लगा दो बंदूक़ों में फेंको तीर-कमानों को — Muntazir Firozabadi
तेरी निगाह-ए-नाज़ के बिस्मिल न होंगे हम हर रंग हर फ़ज़ा में तो शामिल न होंगे हम इक बे-वफ़ा से हम ने यहाँ तक कहा कभी चाहेगा गर ख़ुदा भी तो हासिल न होंगे हम तन्क़ीद करने वालों पे हँसना पड़ा हमें मुश्किल वो चाहते हमें मुश्किल न होंगे हम साहिल पे जाने वाले कभी लौटते नहीं धोके से भी कभी कोई साहिल न होंगे हम हम को है इश्क़ उस से जो है जौन-एलिया या'नी कि आप के कोई क़ाबिल न होंगे हम हम ने तो अपने जिस्म में इक दिल को मारा है क्या फिर भी सोचते हो कि क़ातिल न होंगे हम माना शराब पीते हैं तो क्या हुआ मियाँ या'नी कि आप कहते हैं फ़ाज़िल न होंगे हम — Muntazir Firozabadi
ख़ुश बहुत था एक लम्हा शादमानी देख कर ग़म हुआ मुझ को यूँँ ग़म की तर्जुमानी देख कर जो गुज़रती जा रही है नाम उस का उम्र है ज़िंदगी हैरान है इस की रवानी देख कर हाए इस सय्याद ने दीवार रंगवा दी अजीब उड़ रहे हैं सारे पंछी आसमानी देख कर जुगनुओं ने आज दावत पर बुलाया चाँद को चाँद शब भर टिमटिमाया मेज़बानी देख कर आँखें मेरी थीं लबालब गर्द का पहरा था याँ वो ये समझा धोका है सहरा में पानी देख कर क्या मज़ा गर इश्क़ में थोड़ी बहुत दूरी न हो उस ने ख़ुद से ये कहा मेरी निशानी देख कर एक तो दिल शाइ'राना और फिर मजरूह भी चैन मुझ को आएगा बस बाग़बानी देख कर मुट्ठियों में ख़ाक ले कर आ गए हैं सब के सब कर दो मुझ को दफ़्न मेरी बे-मकानी देख कर वो मोहब्बत के मआ'नी बस बताता ही रहा इश्क़ फिर जाता रहा दश्त-ए-मआ'नी देख कर राज़ थोड़े आओ खोलें उस ख़ुदा के मुंतज़िर इस ज़मीं पर आसमाँ की हुक्मरानी देख कर — Muntazir Firozabadi
इतनी प्यारी हँसी तुम्हारी शहज़ादी सारे घर को जगमग करती शहज़ादी रह रह कर के ख़याल तुम्हारा आया है दिन भर गूँजी बात तुम्हारी शहज़ादी मोटू-पतलू गट्टू-बट्टू देख के तुम पीट रही हो कितनी ताली शहज़ादी चुप हो जाओ चुप हो जाओ चुप हो तुम इतना भी क्या ग़ुस्सा करती शहज़ादी आज तुम्हारा हैप्पी बड्डे होता है बोलो हम से क्या क्या लोगी शहज़ादी सब्ज़ दुआएँ फूट रहीं हैं लब से मेरे मेरी प्यारी राज दुलारी शहज़ादी दीवाली पे मिलना तो अब होगा ही ख़ूब करेंगे आतिश-बाज़ी शहज़ादी इक अच्छा सा शहज़ादा भी ढूँढेंगे अब क्या लोगी जान हमारी शहज़ादी — Muntazir Firozabadi
क़ुर्बत के उन दिनों में भी जाना पड़ा मुझे आँखों से अपनी राज़ छुपाना पड़ा मुझे दिल को तो मैं ने झूठ से बहला लिया मगर थोड़ा बहुत तो शोर मचाना पड़ा मुझे वो चाहता था खेलना मेरे ही जिस्म से फिर दरमियान इश्क़ के आना पड़ा मुझे उस को था शौक़ बीच समुंदर में मरने का साहिल को खींच खींच के लाना पड़ा मुझे बे-रंग करनी थी मुझे अपनी ये ज़िंदगी सो शा'इरी में रंग गिराना पड़ा मुझे उस का ये मानना था कि मैं उस से बढ़ के हूँ कर के तबाह ख़ुद को घटाना पड़ा मुझे तू बन रहा ख़ुदा है तो ये भी हिसाब दे कितना बिगाड़ कर के बनाना पड़ा मुझे इस शे'र को सुनाना था उस शख़्स को मुझे महफ़िल में आप की ये सुनाना पड़ा मुझे — Muntazir Firozabadi

Nazm

"काग़ज़ की नाव " डाइरी के उस मुड़े हुए काग़ज़ पर पक्के रंग की एक स्केच से कुछ लिखा हुआ था जब खोला पूरा पन्ना तो नाम तुम्हारा पाया मतलब नाम तुम्हारा लिखा हुआ था पर जब तक मैं पीछे जाता यादों की पोटली टटोलता तब मैं ने बारिश से सीखा यूँँ होता तो कैसा होता पहली बारिश में कुछ बच्चे झूम रहे थे मेंढक लंबे इंतिज़ार के बा'द कैसे कूद रहे थे एक बच्चे ने बारिश में कुछ जोश दिखाया और अपने नन्हे हाथों से मेज पर रखी डाइरी से वो पन्ना उड़ाया फिर उस ने उस काग़ज़ की नाव बनाई मेरी तरह अपनी ख़्वाहिश नहीं छिपाई अब वो नाम तुम्हारा बारिश के पानी में गुड-गुड गोते खाता है जैसे नाव पे बैठ के मुझ को कोई ये समझाता है क्यूँँ अब तक इंतिज़ार करते हो क्यूँँ पहली बारिश से डरते हो काश कि ख़्वाहिश को न छिपाते तुम भी जगह नाव पर पाते — Muntazir Firozabadi
"दास्ताँ-ए-मुन्तज़िर" गर सुननी है तो फिर एक कहानी सुनो मुन्तज़िर की आँखों में है पानी सुनो मुन्तज़िर किसी से भी डरता नहीं था या यूँँ कहो कोई उस पे मरता नहीं था मुन्तज़िर की ता'लीम तो अच्छी रही थी मगर उस की किस्मत ही कच्ची रही थी मुन्तज़िर ने दिए जलाए बहुत थे मुन्तज़िर के ज़ेहन में साए बहुत थे मगर अब ये आलम अँधेरा अँधेरा हाए मेरे यारों कब होगा सवेरा मुन्तज़िर का दर्द मुन्तज़िर का नहीं है सुना है मुन्तज़िर यहीं हैं कहीं है गिर गई मुन्तज़िर की हवाई हवेली मुन्तज़िर की दाढ़ी में हो गई सफेदी मुन्तज़िर की राह में रोड़े बहुत हैं मुन्तज़िर को काम थोड़े बहुत हैं मुन्तज़िर को कोई अब फटकारता नहीं है फटकारता है गर तो दुत्कारता नहीं है सुना है मुन्तज़िर अब दिखता नहीं है मुन्तज़िर बाज़ारों में बिकता नहीं है काश कि मुन्तज़िर बाज़ारों में बिकता फिर एक दो में नहीं हज़ारों में बिकता मुन्तज़िर को कोई हज़ारी तो मिलती फिर चाहें ज़िगर पे आरी ही चलती मुन्तज़िर की बाँहों में आई तो होती उस ने भी एक दुनिया पाई तो होती शाम-ए-मुन्तज़िर को सुबा मिल जाए गर आप लोगों की दुआ मिल जाए — Muntazir Firozabadi
"थोड़ी छोटी थोड़ी बड़ी बच्ची" आज एक बच्ची थोड़ी सी छोटी थोड़ी बड़ी बच्ची मुझ सेे दूर हो गई है उसे जाना था इलाहाबाद चली गई है बच्ची क्या वो पूरी नानी है मुझे काका चाचा या अंकल नहीं कहती बुलाती है मुझे तेज आवाज़ में सीधे मेरे नाम से अनंत नहीं ग़लत बात अनंत वाक करने चलो अनंत नहीं गिर जाऊँगी अनंत गाड़ी चलाऊँगी अनंत हनुमान चालिसा है अनंत मंकी कैसे करता है खों वो बच्ची थोड़ी सी छोटी थोड़ी बड़ी बच्ची अपने छोटे-छोटे हाथों से बनाती है रोटियाँ कच्ची रोटियाँ पका नहीं सकती वो उन रोटियों को आँच में न उस के पास आँच है न बड़े लोगों का सा दिल वो दिल जो जलता रहता है उस के दिल में तो बस मिठास है हँसी है उल्लास है इन सब के बा'द भी क्या रोटी का पकना ज़रूरी है नहीं नहीं बिल्कुल नहीं बिल्कुल भी नहीं मेरी बच्ची थोड़ी सी छोटी थोड़ी बड़ी बच्ची जब वो बिगड़ती है तो किसी से नहीं बहलती मगर जब भी उस को लगता है कि कोई नाराज़ है घर में कहीं कोई बात है घर में वो फ़ौरन बदल देती है हवा का रुख़ अपनी मखमली बातों से वो भोली भाली बातें लूट लेती हैं सबके ग़मों को महफिलों को उस की मासूम हँसी बाबा का दर्द मिटा देती है ग़म अफ़कार भुला देती है कितनी प्यारी है वो थोड़ी सी छोटी थोड़ी बड़ी बच्ची नज़्म के पूरे होते ही शायद बच्ची पहुँच जाएगी मगर यक़ीं है मुझ को उस की मुसलसल याद आएगी — Muntazir Firozabadi