जिस्म पर अब भी निशांँ हैं सब बराबर लुत्फ़ के
ज़ख़्म भी कितने हसीं मैं ने दिए दिलदार को
ज़ख़्म भी कितने हसीं मैं ने दिए दिलदार को
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इक दूजे की कि़स्मत थे हम इक दूजे से हार गए
मुश्किल तो अब ये लगता है पहले किस पर रोएँ हम
मुश्किल तो अब ये लगता है पहले किस पर रोएँ हम
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इतनी भी क्या जल्दी है मेरी मूरत बनवाने की
थोड़ा सा तो वक़्त लगेगा ख़ुद पत्थर हो जाने में
थोड़ा सा तो वक़्त लगेगा ख़ुद पत्थर हो जाने में
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मुहब्बत के समुंदर की कलाकारी ग़ज़ब की है
कि सब कुछ डूब जाता है मगर तर कुछ नहीं होता
कि सब कुछ डूब जाता है मगर तर कुछ नहीं होता
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"दास्ताँ-ए-मुन्तज़िर"
गर सुननी है तो फिर एक कहानी सुनो
मुन्तज़िर की आँखों में है पानी सुनो
मुन्तज़िर किसी से भी डरता नहीं था
या यूँ कहो कोई उस पे मरता नहीं था
मुन्तज़िर की ता'लीम तो अच्छी रही थी
मगर उस की किस्मत ही कच्ची रही थी
मुन्तज़िर ने दिए जलाए बहुत थे
मुन्तज़िर के ज़ेहन में साए बहुत थे
मगर अब ये आलम अँधेरा अँधेरा
हाए मेरे यारों कब होगा सवेरा
मुन्तज़िर का दर्द मुन्तज़िर का नहीं है
सुना है मुन्तज़िर यहीं हैं कहीं है
गिर गई मुन्तज़िर की हवाई हवेली
मुन्तज़िर की दाढ़ी में हो गई सफेदी
मुन्तज़िर की राह में रोड़े बहुत हैं
मुन्तज़िर को काम थोड़े बहुत हैं
मुन्तज़िर को कोई अब फटकारता नहीं है
फटकारता है गर तो दुत्कारता नहीं है
सुना है मुन्तज़िर अब दिखता नहीं है
मुन्तज़िर बाज़ारों में बिकता नहीं है
काश कि मुन्तज़िर बाज़ारों में बिकता
फिर एक दो में नहीं हज़ारों में बिकता
मुन्तज़िर को कोई हज़ारी तो मिलती
फिर चाहें ज़िगर पे आरी ही चलती
मुन्तज़िर की बाँहों में आई तो होती
उस ने भी एक दुनिया पाई तो होती
शाम-ए-मुन्तज़िर को सुबा मिल जाए
गर आप लोगों की दुआ मिल जाए
Read Fullमुन्तज़िर की आँखों में है पानी सुनो
मुन्तज़िर किसी से भी डरता नहीं था
या यूँ कहो कोई उस पे मरता नहीं था
मुन्तज़िर की ता'लीम तो अच्छी रही थी
मगर उस की किस्मत ही कच्ची रही थी
मुन्तज़िर ने दिए जलाए बहुत थे
मुन्तज़िर के ज़ेहन में साए बहुत थे
मगर अब ये आलम अँधेरा अँधेरा
हाए मेरे यारों कब होगा सवेरा
मुन्तज़िर का दर्द मुन्तज़िर का नहीं है
सुना है मुन्तज़िर यहीं हैं कहीं है
गिर गई मुन्तज़िर की हवाई हवेली
मुन्तज़िर की दाढ़ी में हो गई सफेदी
मुन्तज़िर की राह में रोड़े बहुत हैं
मुन्तज़िर को काम थोड़े बहुत हैं
मुन्तज़िर को कोई अब फटकारता नहीं है
फटकारता है गर तो दुत्कारता नहीं है
सुना है मुन्तज़िर अब दिखता नहीं है
मुन्तज़िर बाज़ारों में बिकता नहीं है
काश कि मुन्तज़िर बाज़ारों में बिकता
फिर एक दो में नहीं हज़ारों में बिकता
मुन्तज़िर को कोई हज़ारी तो मिलती
फिर चाहें ज़िगर पे आरी ही चलती
मुन्तज़िर की बाँहों में आई तो होती
उस ने भी एक दुनिया पाई तो होती
शाम-ए-मुन्तज़िर को सुबा मिल जाए
गर आप लोगों की दुआ मिल जाए
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जो मुझ से दूर जाना चाहता था
वो मेरे साथ ही पकड़ा गया था
वो मेरे साथ ही पकड़ा गया था
मैं अपनी मुट्ठियों में क़ैद था या
मुझे ऐसा किसी ने कर दिया था
मिरी आँखें तो मैं ने नोच लीं थीं
मुझे फिर भी किसी ने पढ़ लिया था
बिछड़ते वक़्त भी दिल कुछ न बोला
ये पागल ज़ब्त कर के रह गया था
था उस से इश्क़ का इज़हार करना
मुझे कुछ और ही कहना पड़ा था
उसे मुझ से रिहाई चाहिए थी
मैं अपनी लाश पर बैठा हुआ था
कहा दोनों ने इक दूजे को बेहतर
बस उस के बा'द झगड़ा हो गया था
जहाँ के तब्सिरे से तंग आ कर
बहुत नुक़सान हम ने कर लिया था
सितारे बढ़ रहे थे मेरी जानिब
मगर वो चाँद क्यूँ ठहरा हुआ था
मिरे यारो तुम्हारी ही बदौलत
सफ़र जारी हुआ है, रुक गया था
कभी आवाज़ दी थी 'मुंतज़िर' को
मैं अपने आप से टकरा गया था
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दिल को तो मैं ने झूठ से बहला लिया मगर
थोड़ा बहुत तो शोर मचाना पड़ा मुझे
वो चाहता था खेलना मेरे ही जिस्म से
फिर दरमियान इश्क़ के आना पड़ा मुझे
उस को था शौक़ बीच समुंदर में मरने का
साहिल को खींच खींच के लाना पड़ा मुझे
बे-रंग करनी थी मुझे अपनी ये ज़िंदगी
सो शा'इरी में रंग गिराना पड़ा मुझे
उस का ये मानना था कि मैं उस से बढ़ के हूँ
कर के तबाह ख़ुद को घटाना पड़ा मुझे
तू बन रहा ख़ुदा है तो ये भी हिसाब दे
कितना बिगाड़ कर के बनाना पड़ा मुझे
इस शे'र को सुनाना था उस शख़्स को मुझे
महफ़िल में आप की ये सुनाना पड़ा मुझे
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इक बे-वफ़ा से हम ने यहाँ तक कहा कभी
चाहेगा गर ख़ुदा भी तो हासिल न होंगे हम
तन्क़ीद करने वालों पे हँसना पड़ा हमें
मुश्किल वो चाहते हमें मुश्किल न होंगे हम
साहिल पे जाने वाले कभी लौटते नहीं
धोके से भी कभी कोई साहिल न होंगे हम
हम को है इश्क़ उस से जो है जौन-एलिया
या'नी कि आप के कोई क़ाबिल न होंगे हम
हम ने तो अपने जिस्म में इक दिल को मारा है
क्या फिर भी सोचते हो कि क़ातिल न होंगे हम
माना शराब पीते हैं तो क्या हुआ मियाँ
या'नी कि आप कहते हैं फ़ाज़िल न होंगे हम
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