जो दूसरों की ख़ताएँ मुआ'फ़ करते हैं
दर-अस्ल दिल से कुदूरत वो साफ़ करते हैं
हर एक बात में हामी नहीं भरी जाती
उन्हें गिला है कि हम इख़्तिलाफ़ करते हैं
कभी गुमान की सूरत कभी यक़ीन के साथ
दिलों के राज़ का हम इंकिशाफ़ करते हैं
हमें यक़ीं भी दिलाते हैं साथ देने का
वो साज़िशें भी हमारे ख़िलाफ़ करते हैं
कहीं भी प्यार से रहना उन्हें क़ुबूल नहीं
जहाँ भी जाते हैं दिल में शिगाफ़ करते हैं
उन्हीं से अज़्मत-ए-उर्दू बहाल है 'राग़िब'
जो गुफ़्तुगू में अदा शीन क़ाफ़ करते हैं
— Iftikhar Raghib















