Mukesh Jha

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@MukeshJha

Mukesh Jha shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Mukesh Jha's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

रंग गालों पे लगा रहने दो ख़ूब जँचता है ये गहना तुम पर — Mukesh Jha
वा'दा करो कि हाथ छुड़ा कर न जाओगे वा'दा करो कि सात जनम तक रहेगा इश्क़ — Mukesh Jha
वो राधा की तरह है साथ मेरे ख़यालों में वो मेरी रुक्मणी है — Mukesh Jha
मैं मोहब्बत में नहीं पड़ता मगर अब के बरस आज़माना है मुझे अपना हुनर अब के बरस — Mukesh Jha
ले रहा था मैं ज़िन्दगी के मज़े फिर वो बोली कि अब मेरी बारी — Mukesh Jha
मैं जानता हूँ ज़ाइक़ा हर चॉकलेट का मेरे लबों पे आज तू अपने लबों को रख — Mukesh Jha
इतनी शोहरत तो मेरी आज भी इस शहर में है एक पत्ता न हिले मेरी इजाज़त के बग़ैर — Mukesh Jha
खींची जो उस ने आँख में काजल की इक लकीर मैं ने भी अपने सीने पे इक हाथ रख लिया — Mukesh Jha
जितना था सब गँवा दिया मैं ने इश्क़ भी, दोस्त भी, ज़माना भी — Mukesh Jha
मैं कहीं गुम हूँ आजकल शायद जल गए होंठ चाय पीते हुए — Mukesh Jha

Ghazal

जितना भी हम जिए उतने ही परेशान रहे हो गए ख़ाक तो भी दर्द से सोज़ान रहे ज़िन्दगी जी न सकूँगा कभी भी चैन से मैं मेरे सीने में अगर ज़िंदा ये अरमान रहे हम तलबगार-ए-रिहाई-ए-मुहब्बत थे मगर उम्र भर के लिए हम क़ैदी-ए-ज़िंदान रहे बुत-परस्ती का सिला तो हमें मिलना ही था साँस चलती थी मगर जिस्म से बे-जान रहे बादा-ए-नाब है ये ज़िन्दगी या ख़ून-ए-जिगर कोई बतला दे तो ता-उम्र ये एहसान रहे एक भी गुल न खिला मेरे इन अश्कों से कभी जाने कितने मेरी आँखों में बयाबान रहे मिस्ल-ए-तहरीर है ये हुस्न या मिस्ल-ए-नग़्मा जितना भी देखा तुझे उतने ही हैरान रहे — Mukesh Jha
ऐसी लड़की हमें आफ़त भी बहुत लगती है जिस को पाने में मशक़्क़त भी बहुत लगती है हम हैं सहरा में हर इक बूँद के तरसे हुए लोग हम को दो दिन की मुहब्बत भी बहुत लगती है दिन में हम इश्क़ से उकताए हुए फिरते हैं रात को तेरी ज़रूरत भी बहुत लगती है पर्स में कुछ भी नहीं इक तेरी फोटो के सिवा सोचता हूँ तो ये दौलत भी बहुत लगती है उस ने जब गाल बढ़ाया तो समझ आया हमें चूमने के लिए हिम्मत भी बहुत लगती है दिल ने कुछ ऐसे भरम पाल रखे हैं जिन को सच अगर मानूँ तो लज़्ज़त भी बहुत लगती है चाहने के लिए इक लम्हा बहुत होता है कभी इक शख़्स की सूरत भी बहुत लगती है प्यार करने के लिए कौन खँगाले दुनिया आशिक़ों को तो खुली छत भी बहुत लगती है — Mukesh Jha
जब तुम ने मेरा नाम पुकारा ख़ुशी ख़ुशी मैं हो गया था तब से तुम्हारा ख़ुशी ख़ुशी दरिया के जैसी तुम में नज़ाकत है इस लिए दरिया में अपना पैर उतारा ख़ुशी ख़ुशी चौबीस घंटे में से मुझे दे दो जितना भी कर लूँगा उतने में ही गुज़ारा ख़ुशी ख़ुशी माँगा तुम्हें ख़ुदा से तो उस वक़्त जान-ए-जाँ टूटा फ़लक से एक सितारा ख़ुशी ख़ुशी मुझ को है रहनुमा की ज़रूरत सो आज तुम मेरा भी हाथ थाम लो यारा ख़ुशी ख़ुशी बेहतर है उस के इश्क़ में फ़ुर्क़त न हो कभी मैं इस लिए ही जंग में हारा ख़ुशी ख़ुशी मैं ज़िन्दगी की मार से गिरने लगूँ अगर तो यार मुझ को देना सहारा ख़ुशी ख़ुशी जिस हुस्न को ग़ज़ल ये सुना दोगे तुम 'मुकेश' हो जाएगा वो यार तुम्हारा ख़ुशी ख़ुशी — Mukesh Jha
मैं कभी तेरे बराबर नहीं हो सकता दोस्त मैं तो मिट्टी हूँ सो पत्थर नहीं हो सकता दोस्त मैं तेरी आँख का आँसू तो हो सकता हूँ मगर मैं तेरी आँख का कंकर नहीं हो सकता दोस्त मेरी तासीर अलग है तेरी तासीर अलग मैं कभी तुझ सा सितमगर नहीं हो सकता दोस्त कितनों ने प्यास बुझाई है रवानी में मेरी चाह कर भी मैं समुंदर नहीं हो सकता दोस्त मैं ज़ियादास ज़ियादा तेरा हो भी जाऊँ तू मगर मुझ को मुयस्सर नहीं हो सकता दोस्त कम से कम इक दफ़ा तो तय है मुहब्बत में हार इश्क़ में कोई सिकंदर नहीं हो सकता दोस्त वो समझता है ग़लत मुझ को हर इक बात पे पर ये यक़ीं है वो सितमगर नहीं हो सकता दोस्त ख़ुद को ख़ुद में ही छुपाए हुए फिरता हूँ यहाँ जितना अंदर हूँ मैं बाहर नहीं हो सकता दोस्त — Mukesh Jha
ज़ुल्फ़ के डोरे न डालो यार मुझ पर आज इतना तो करो उपकार मुझ पर क्या हुआ मुझ को मुझे कुछ तो बताओ हँस रहे हैं इश्क़ के बीमार मुझ पर कब तलक फेरेंगे मुझ सेे आप नज़रें इक नज़र तो डालिए सरकार मुझ पर रोज़ तो झगड़ा किया करते हो मुझ से आज क्यूँँ बरसा रहे हो प्यार मुझ पर उस पे मैं ने भी कही दो चार ग़ज़लें उस ने भी नज़्में कही दो चार मुझ पर जब से मैं तेरी कहानी का हूँ हिस्सा अब नहीं जँचता कोई किरदार मुझ पर जानता था घूम फिर के आएगा ही इश्क़ का इल्ज़ाम आख़िरकार मुझ पर क्या पता मुझ को कि आख़िर क्यूँँ बिठाए उस के घरवालों ने पहरेदार मुझ पर इश्क़ तो आसान है, मैं कर भी लेता है टिका लेकिन मेरा घर-बार मुझ पर — Mukesh Jha

Nazm

"ख़ामुशी" सभी ने कहा दिल लगाना ग़लत है मगर मैं ये समझा ज़माना ग़लत है ये मेरी ख़ता है सज़ा भी मुझे दे दुआ भी मुझे दे क़ज़ा भी मुझे दे अगर हो सका तो कभी लौट कर भी तुझे मैं मिलूँगा यहीं पर कहीं पर मेरी ये जो दुनिया तेरे ही लिए थी ले मैं छोड़ता हूँ तेरी सर-ज़मीं पर मगर याद रखना मेरी आशिक़ी को मेरे साथ गुज़री वो हर इक घड़ी को मिलेंगे अगर हम कभी इस जहाँ में तो फिर से सुनेंगे उसी ख़ामुशी को वही ख़ामुशी जो हमारे लबों पे मुलाक़ात के वक़्त आती थी अक्सर वही ख़ामुशी जो हमारे दिलों में नए प्यार के गीत गाती थी अक्सर मुझे है ख़बर सब बदल सा गया है मगर ख़ामुशी को ये कहते सुना है चलो आज फिर से वही गीत गाएँ चलो अपनी चाहत को फिर आज़माएँ — Mukesh Jha