नए चेहरों का पीछा कर रहा हूँ

मैं अपना ज़ख़्म गहरा कर रहा हूँ

मुहब्बत में मुझे लगता है अक्सर
मैं ख़ुद के साथ धोखा कर रहा हूँ

चलो देखें ये कब तक साथ देगी
मैं साँसों पे भरोसा कर रहा हूँ

मुझे मिलता नहीं मिलने का मौक़ा
मगर फिर भी मैं वा'दा कर रहा हूँ

समझ आता नहीं है ग़म किसी को
सो हँसने का दिखावा कर रहा हूँ

गुज़र जाए ख़ुशी से ज़िन्दगी अब
किसी की याद इकट्ठा कर रहा हूँ

जिन्हें मतलब नहीं मेरे दुखों से
उन्हीं लोगों से शिकवा कर रहा हूँ

जहाँ पर चीख़ती है ख़ामुशी भी
वहाँ मैं ख़ुद को गूँगा कर रहा हूँ

— Mukesh Jha

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