उस का चेहरा पढ़ा है दिन भर से
प्यार उमड़ने लगा है अंदर से
उस की जादूगरी का है ये असर
फूल खिलने लगे हैं पत्थर से
मुझ से मिलती है ऐसे वो अक्सर
जैसे दरिया मिले समुंदर से
उस को दिल में बसा लिया मैं ने
पाँव आगे बढ़े हैं चादर से
कौन पूछे अब उस के घर का पता
लेना-देना ही क्या है घर-वर से
उस ने पूछा कि क्यूँ लिखी ये ग़ज़ल
नाम उस का नहीं लिया डर से
सारी दुनिया उदास रहती है
वो अगर हट गया हो मंज़र से
वो उतरती गई मेरे दिल में
ज्यूँ उतरती है ओस अंबर से
फिर अचानक बदल गया मौसम
उस ने ज़ुल्फ़ें झटक दी हैं सर से
— Mukesh Jha















