मैं ख़ुद को एक गड्ढे में क्यूँँ दबा रहा हूँ
इक फूल के लिए ख़ुद मिट्टी बना रहा हूँ
मालूम है मुझे वो बच्ची नहीं है फिर भी
मैं जान बूझ कर के सर पर चढ़ा रहा हूँ
जिस फूल में मिरी कुल दुनिया रची-बसी है
उस के लिए मैं दिल में सूरज उगा रहा हूँ
कोई नहीं मिला जब इस भोर के समय में
सो मैं भी क्रांति को कम्बल में सुला रहा हूँ
उस के मकान में जिस से रौशनी हुई है
उस लैम्प में मैं अपना ही खून पा रहा हूँ
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