Jaani Lakhnavi

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Jaani Lakhnavi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jaani Lakhnavi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ज़िंदगी हम ने तुझे दूर से पहचाना है तू किसी रिन्द का उजड़ा हुआ मैख़ाना है — Jaani Lakhnavi
कुछ तबीयत में उदासी भी हुआ करती है हर कोई इश्क़ का मारा हो, ज़रूरी तो नहीं — Jaani Lakhnavi
उठा के लाते हैं सहरा से रोज़ ख़ुद को हम बड़े सलीक़े से इक याद छोड़ आती है — Jaani Lakhnavi
अश्क़-ओ-ख़ून घुलते हैं तब दीदा-ए-तर बनती है दास्तान इश्क़ में मरने से अमर बनती है — Jaani Lakhnavi
हैरान इस क़दर भी हमपर न हों ख़ुदारा एक शक़्स बच गया है नाराज़ कर रहे हैं — Jaani Lakhnavi

Ghazal

ये आखरी सदा है मेरी हर सदा के बा'द इक इब्तेदा भी होती है हर इन्तेहा के बा'द औज-ए-सुरय्या तुझ पे भी होंगे किसी के पाँव क्या तू ने ये भी सोचा था तेरी बिना के बा'द ? पहले गंवाया दस्त-ए-हुनर फिर हुनर गया पास एक्लव्य क्या है गुरु दक्षिणा के बा'द ? डर उस सेे आसमाँ में जो होने लगा है अब इक फ़ैसला कहीं तेरी जोर-ओ-जफा के बा'द कर तो रहे हैं आप मुझे अनसुना मगर मैं जानता हूँ होगा जो सौत-ओ-सदा के बा'द तहतुस्सरा तो ले के चला है मुझे जुनूँ पर मैं ये सोचता हूँ कि तहतुस्सरा के बा'द ? बाद-ए-सबास क़ब्ल था "जानी" भी होशियार उस से ना पूछ क्या हुआ बाद-ए-सबा के बा'द — Jaani Lakhnavi
सदा ए आह ओ फ़ुग़ाँ जब भी रंग लाती है खिज़ां-रसीदा ज़मीनों पे गुल खिलाती है गुलों के जिस्म पे चेहरा हवा बनाती है फिर उस के बा'द मुझे रौशनी सताती है उठा के लाते हैं सहरा से रोज़ ख़ुद को हम बड़े सलीक़े से इक याद छोड़ आती है सवाल ए गर्दिश ए दौरां की मुंतशिर मिट्टी खिलौने वक़्त के कैसे बनाए जाती है बना के बैठा हूँ मिट्टी के ढेर पे क्या कुछ ये देखना है के अब क्या हवा बनाती है किसी के जिस्म को मंज़र बनाने लगता हूँ सुकूते शाम मुझे दास्ताँ सुनाती है गुरेज़ पा हुई जाती है आबरू मुझ सेे हया लिबास में पैबन्द टाँक जाती है क़ज़ा ने छेड़ दिया साज़-ए-आखरी 'जानी' लो दरमियान-ए-क़फ़स अब बहार आती है — Jaani Lakhnavi
ख़बर है मेह्रूमियों से आगे निकल चुका है सफीर वीरानियों से आगे निकल चुका है हमें ये ताक़ीद की गई है के हँसते रहिए सो केह्क़हा सिस्कियों से आगे निकल चुका है ये किस ताक़्क़ुब में बुझ रही हैं हमारी आँखें ये कौन बीनाईयों से आगे निकल चुका है मक़ाम ए हैरत पे अक़्ल पहुंची, खुला मुअम्मा क़यास हैरानियों से आगे निकल चुका है हवा से महलों में आज क़न्दील जल बुझी हैं प इक दिया आंधियों से आगे निकल चुका है ए शोब्दागर ख़बर है तुझ को के शोब्दाबीं तेरे तमाशाईओं से आगे निकल चुका है तबीब आबे हयात लाए हैं कासा भर लो मरीज़ आसानियों से आगे निकल चुका है क़फस में रह कर लगा है जी ऐसे बेडियों से असीर आज़ादीयों से आगे निकल चुका है बयान के जंगलों में जिस को तलाश्ते हो वो ज़ब्त की वादियों से आगे निकल चुका है सुखन सलाख़ें भी जंग आलूद हो चुकि हैं शऊर भी क़ाफियों से आगे निकल चुका है फ़ना के बय्यत में आ चुका है जुनूने "जानी" बक़ा के अब ज़ावियों से आगे निकल चुका है — Jaani Lakhnavi
तबाह रस्तों की हम सेफ़र है बड़ी पुरानी सुकूत की धुन चले भी आओ हमारे घर तक तुम्हें मिलेगी सुकूत की धुन कोई तजल्ली किसी समुंदर में जा गिरी हो अँधेरी शब में यूँँही अचानक हुई है तारी ये मुझ पे क़ुदसी सुकूत की धुन ख़मोश दरया से मैं मुसलसल सवाल ए नग़मात कर रहा था जवाब में ये सवाल आया सुनाई देगी सुकूत की धुन? उदास सरगम ख़मोश लहजा दलीले एहले हुनर यही है सो मेरी क़िस्मत में लिखी उस ने फ़क़त उदासी, सुकूत की धुन सियाह शब की मुख़ालिफ़त में हो जैसे कोई गरीब जुगनु हमारे जिस्मों में पल रही है यूँ बे-मआ'नी सुकूत की धुन हुए हैं कुछ ऐसे हादसे जो उतर गए हैं जिगर के अंदर तभी से शह-रग में बज रही है मेरे ख़ुदाई सुकूत की धुन ये शोर ये वलवले कहाँ रास आने थे इस लिए मैं 'जानी' भटक रहा हूँ अज़ल से सुनते हुए सराबी सुकूत की धुन — Jaani Lakhnavi