sada ae aah o fugan jab bhi rang laati hai | सदा ए आह ओ फुग़ां जब भी रंग लाती है

  - Jaani Lakhnavi

सदा ए आह ओ फुग़ां जब भी रंग लाती है
खिज़ां-रसीदा ज़मीनों पे गुल खिलाती है

गुलों के जिस्म पे चेहरा हवा बनाती है
फिर उसके बाद मुझे रौशनी सताती है

उठा के लाते हैं सहरा से रोज़ खुद को हम
बड़े सलीके से इक याद छोड़ आती है

सवाल ए गर्दिश ए दौरां की मुंतशिर मिट्टी
खिलौने वक़्त के कैसे बनाये जाती है

बना के बैठा हूँ मिट्टी के ढेर पे क्या कुछ
यह देखना है के अब क्या हवा बनाती है

किसी के जिस्म को मंज़र बनाने लगता हूँ
सुकूते शाम मुझे दास्ताँ सुनाती है

गुरेज़ पा हुई जाती है आबरू मुझसे
हया लिबास में पैबन्द टाँक जाती है

क़ज़ा ने छेड़ दिया साज़-ए-आखरी 'जानी'
लो दरमियान-ए-क़फ़स अब बहार आती है

  - Jaani Lakhnavi

Promise Shayari

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