खेलूँगा फिर कभी कोई दाँव विसाल पर
फ़िलहाल मुन्हसिर हूँ मैं अपने मलाल पर
सूरत नहीं उरूज की, सब कुछ तिलस्म है
दुनिया की नींव रखी गई है ज़वाल पर
देखा है जब से उस ने नतीजा उड़ान का
खूद ही कतर दिए हैं परिंदे ने बाल-पर
ठोकर पे रख न दे तेरे सिक्कों को, बादशाह
दरवेश आ रहा है अब अपने कमाल पर
इक-टक न देखिए के इसे टूटना भी है
रह-रह के डाला कीजे निगाहें सिफाल पर
वहशत की कश्तियों पे हैं 'जानी' सवार, और
आमादा हो रही हैं ये लहरें उछाल पर
— Jaani Lakhnavi















