Habib Jalib

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Habib Jalib shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Habib Jalib's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

लाख कहते रहें ज़ुल्मत को न ज़ुल्मत लिखना हम ने सीखा नहीं प्यारे ब-इजाज़त लिखना — Habib Jalib
एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं — Habib Jalib
पा सकेंगे न उम्र भर जिस को जुस्तुजू आज भी उसी की है — Habib Jalib
कुछ लोग ख़यालों से चले जाएँ तो सोएँ बीते हुए दिन रात न याद आएँ तो सोएँ — Habib Jalib
दुनिया तो चाहती है यूँँही फ़ासले रहें दुनिया के मश्वरों पे न जा उस गली में चल — Habib Jalib
वो देखने मुझे आना तो चाहता होगा मगर ज़माने की बातों से डर गया होगा — Habib Jalib

Ghazal

दिल पर जो ज़ख़्म हैं वो दिखाएँ किसी को क्या अपना शरीक-ए-दर्द बनाएँ किसी को क्या हर शख़्स अपने अपने ग़मों में है मुब्तला ज़िंदाँ में अपने साथ रुलाएँ किसी को क्या बिछड़े हुए वो यार वो छोड़े हुए दयार रह रह के हम को याद जो आएँ किसी को क्या रोने को अपने हाल पे तन्हाई है बहुत उस अंजुमन में ख़ुद पे हँसाएँ किसी को क्या वो बात छेड़ जिस में झलकता हो सब का ग़म यादें किसी की तुझ को सताएँ किसी को क्या सोए हुए हैं लोग तो होंगे सुकून से हम जागने का रोग लगाएँ किसी को क्या 'जालिब' न आएगा कोई अहवाल पूछने दें शहर-ए-बे-हिसाँ में सदाएँ किसी को क्या — Habib Jalib
उस र'ऊनत से वो जीते हैं कि मरना ही नहीं तख़्त पर बैठे हैं यूँँ जैसे उतरना ही नहीं यूँँ मह-ओ-अंजुम की वादी में उड़े फिरते हैं वो ख़ाक के ज़र्रों पे जैसे पाँव धरना ही नहीं उन का दा'वा है कि सूरज भी उन्हीं का है ग़ुलाम शब जो हम पर आई है उस को गुज़रना ही नहीं क्या इलाज उस का अगर हो मुद्दआ' उन का यही एहतिमाम रंग-ओ-बू गुलशन में करना ही नहीं ज़ुल्म से हैं बरसर-ए-पैकार आज़ादी-पसंद उन पहाड़ों में जहाँ पर कोई झरना ही नहीं दिल भी उन के हैं सियह ख़ूराक-ए-ज़िंदाँ की तरह उन से अपना ग़म बयाँ अब हम को करना ही नहीं इंतिहा कर लें सितम की लोग अभी हैं ख़्वाब में जाग उट्ठे जब लोग तो उन को ठहरना ही नहीं — Habib Jalib
न डगमगाए कभी हम वफ़ा के रस्ते में चराग़ हम ने जलाए हवा के रस्ते में किसे लगाए गले और कहाँ कहाँ ठहरे हज़ार ग़ुंचा-ओ-गुल हैं सबा के रस्ते में ख़ुदा का नाम कोई ले तो चौंक उठते हैं मिले हैं हम को वो रहबर ख़ुदा के रस्ते में कहीं सलासिल-ए-तस्बीह और कहीं ज़ुन्नार बिछे हैं दाम बहुत मुद्दआ' के रस्ते में अभी वो मंज़िल-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र नहीं आई है आदमी अभी जुर्म ओ सज़ा के रस्ते में हैं आज भी वही दार-ओ-रसन वही ज़िंदाँ हर इक निगाह-ए-रुमूज़-आश्ना के रस्ते में ये नफ़रतों की फ़सीलें जहालतों के हिसार न रह सकेंगे हमारी सदा के रस्ते में मिटा सके न कोई सैल-ए-इंक़लाब जिन्हें वो नक़्श छोड़े हैं हम ने वफ़ा के रस्ते में ज़माना एक सा 'जालिब' सदा नहीं रहता चलेंगे हम भी कभी सर उठा के रस्ते में — Habib Jalib
दिल वालो क्यूँँ दिल सी दौलत यूँँ बे-कार लुटाते हो क्यूँँ इस अँधियारी बस्ती में प्यार की जोत जगाते हो तुम ऐसा नादान जहाँ में कोई नहीं है कोई नहीं फिर इन गलियों में जाते हो पग पग ठोकर खाते हो सुंदर कलियो कोमल फूलो ये तो बताओ ये तो कहो आख़िर तुम में क्या जादू है क्यूँँ मन में बस जाते हो ये मौसम रिम-झिम का मौसम ये बरखा ये मस्त फ़ज़ा ऐसे में आओ तो जानें ऐसे में कब आते हो हम से रूठ के जाने वालो इतना भेद बता जाओ क्यूँँ नित रातो को सपनों में आते हो मन जाते हो चाँद-सितारों के झुरमुट में फूलों की मुस्काहट में तुम छुप-छुप कर हँसते हो तुम रूप का मान बढ़ाते हो चलते फिरते रौशन रस्ते तारीकी में डूब गए सो जाओ अब 'जालिब' तुम भी क्यूँँ आँखें सुलगाते हो — Habib Jalib
यूँँ वो ज़ुल्मत से रहा दस्त-ओ-गरेबाँ यारो उस से लर्ज़ां थे बहुत शब के निगहबाँ यारो उस ने हर-गाम दिया हौसला-ए-ताज़ा हमें वो न इक पल भी रहा हम से गुरेज़ाँ यारो उस ने मानी न कभी तीरगी-ए-शब से शिकस्त दिल अँधेरों में रहा उस का फ़रोज़ाँ यारो उस को हर हाल में जीने की अदा आती थी वो न हालात से होता था परेशाँ यारो उस ने बातिल से न ता-ज़ीस्त किया समझौता दहर में उस सा कहाँ साहब-ए-ईमाँ यारो उस को थी कश्मकश-ए-दैर-ओ-हरम से नफ़रत उस सा हिन्दू न कोई उस सा मुसलमाँ यारो उस ने सुलतानी-ए-जम्हूर के नग़्में लिक्खे रूह शाहों की रही उस से परेशाँ यारो अपने अश'आर की शम्ओं' से उजाला कर के कर गया शब का सफ़र कितना वो आसाँ यारो उस के गीतों से ज़माने को सँवारें यारो रूह-ए-'साहिर' को अगर करना है शादाँ यारो — Habib Jalib

Nazm

मैं तुझे फूल कहूँ और कहूँ भंवरो से आओ उस फूल का रस चूस के नाचो-झूमो मैं तुझे शम्अ' कहूँ और कहूँ परवानो आओ उस शम्अ' के होंटों को ख़ुशी से चूमो मैं तिरी आँख को तश्बीह दूँ मयख़ाने से और ख़ुद ज़हर-ए-जुदाई का तलबगार रहूँ ग़ैर सोए तिरी ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव में और मैं चाँदनी रातों मैं फ़क़त शे'र कहूँ मुझ से ये तेरे क़सीदे न लिखे जाएँगे मुझ से तेरे लिए ये ग़ज़लें न कही जाएँगी याद में तेरी मैं सुलगा न सकूँगा आँखें सख़्तियाँ दर्द की मुझ से न सही जाएँगी शहर में ऐसे मुसव्विर हैं जो सिक्कों के एवज़ हुस्न में लैला-ओ-अज़रा से बढ़ा देंगे तुझे तूल दे कर तिरी ज़ुल्फ़ों को शब-ए-ग़म की तरह फ़न के ए'जाज़ से नागिन सी बना देंगे तुझे तुझ को शहर की ज़रूरत है मोहब्बत की मुझे ऐ हसीना तिरी मंज़िल मिरी मंज़िल में नहीं नाच घर तेरी निगाहों में हैं रक़्साँ लेकिन इस तअ'य्युश की तमन्नाएँ मिरे दिल में नहीं देख के ग़ैर के पहलू में तुझे रक़्स-कुनाँ भीग जाती है मिरी आँख सरिश्क-ए-ग़म से मुझ को बरसों की ग़ुलामी का ख़याल आता है जिस ने अंदाज़-ए-वफ़ा छीन लिया है हम से मुझ को भँवरा न समझ मुझ को पतंगा न समझ मुझ को इंसान समझ मेरी सदाक़त से न खेल तेरी तफ़रीह का सामाँ न बनूँगा हरगिज़ मेरी दुनिया है यही मेरी मोहब्बत से न खेल — Habib Jalib
पूछ न क्या लाहौर में देखा हम ने मियाँ-'नज़ीर' पहनें सूट अंग्रेज़ी बोलें और कहलाएँ 'मीर' चौधरियों की मुट्ठी में है शाइ'र की तक़दीर रोए भगत कबीर इक-दूजे को जाहिल समझें नट-खट बुद्धीवान मेट्रो में जो चाय पिलाए बस वो बाप समान सब से अच्छा शाइ'र वो है जिस का यार मुदीर रोए भगत कबीर सड़कों पर भूके फिरते हैं शाइ'र मूसीक़ार एक्ट्रसों के बाप लिए फिरते हैं मोटर-कार फ़िल्म-नगर तक आ पहुँचे हैं सय्यद पीर फ़क़ीर रोए भगत कबीर लाल-दीन की कोठी देखी रंग भी जिस का लाल शहर में रह कर ख़ूब उड़ाए दहक़ानों का माल और कहे अज्दाद ने बख़्शी मुझ को ये जागीर रोए भगत कबीर जिस को देखो लीडर है और से मिलो वकील किसी तरह भरता ही नहीं है पेट है उन का झील मजबूरन सुनना पड़ती है उन सब की तक़दीर रोए भगत कबीर महफ़िल से जो उठ कर जाए कहलाए वो बोर अपनी मस्जिद की ता'रीफ़ें बाक़ी जूते-चोर अपना झंग भला है प्यारे जहाँ हमारी हीर रोए भगत कबीर — Habib Jalib
दिन-भर कॉफ़ी-हाउस में बैठे कुछ दुबले-पतले नक़्क़ाद बहस यही करते रहते हैं सुस्त अदब की है रफ़्तार सिर्फ़ अदब के ग़म में ग़लताँ चलने फिरने से लाचार चेहरों से ज़ाहिर होता है जैसे बरसों के बीमार उर्दू-अदब में ढाई हैं शाइ'र 'मीर' ओ 'ग़ालिब' आधा 'जोश' या इक-आध किसी का मिस्रा या 'इक़बाल' के चंद अश'आर या फिर नज़्म है इक चूहे पर हामिद-'मदनी' का शहकार कोई नहीं है अच्छा शाइ'र कोई नहीं अफ़्साना-निगार 'मंटो' 'कृष्ण' 'नदीम' और 'बेदी' इन में जान तो है लेकिन ऐब ये है इन के हाथों में कुंद ज़बाँ की है तलवार 'आली' अफ़सर 'इंशा' बाबू 'नासिर' 'मीर' के बर-ख़ुरदार 'फ़ैज़' ने जो अब तक लिक्खा है क्या लिक्खा है सब बे-कार उन को अदब की सेह्हत का ग़म मुझ को उन की सेह्हत का ये बेचारे दुख के मारे जीने से हैं क्यूँँ बे-ज़ार हुस्न से वहशत इश्क़ से नफ़रत अपनी ही सूरत से प्यार ख़ंदा-ए-गुल पर एक तबस्सुम गिर्या-ए-शबनम से इनकार — Habib Jalib
दिल की कोंपल हरी तेरे होने से है ज़िंदगी ज़िंदगी तेरे होने से है किश्त-ज़ारों में तू कार-ख़ानों में तू इन ज़मीनों में तू आसमानों में तू शे'र में नस्र में दास्तानों में तू शहर ओ सहरा में तू और चटानों में तू हुस्न-ए-सूरत-गरी तेरे होने से है ज़िंदगी ज़िंदगी तेरे होने से है तुझ से है आफ़रीनश नुमू इर्तिक़ा तुझ से हैं क़ाफ़िले रास्ते रहनुमा तू न होती तो क्या था चमन क्या सबा कैसे कटता सफ़र दर्द का यास का आस की रौशनी तेरे होने से है ज़िंदगी ज़िंदगी तेरे होने से है ख़ौफ़ ओ नफ़रत की हर हद मिटाने निकल अक़्ल-ओ-दानिश की शमएँ जलाने निकल ज़ेर-दस्तों की हिम्मत बँधाने निकल हम-ख़याल और अपने बनाने निकल अब कुशा बे-कसी तेरे होने से है ज़िंदगी ज़िंदगी तेरे होने से है — Habib Jalib
लायल-पूर इक शहर है जिस में दिल है मिरा आबाद धड़कन धड़कन साथ रहेगी उस बस्ती की याद मीठे बोलों की वो नगरी गीतों का संसार हँसते-बसते हाए वो रस्ते नग़्मा-रेज़ दयार वो गलियाँ वो फूल वो कलियाँ रंग-भरे बाज़ार मैं ने उन गलियों फूलों कलियों से किया है प्यार बर्ग-ए-आवारा में बिखरी है जिस की रूदाद लायल-पूर इक शहर है जिस में दिल है मिरा आबाद कोई नहीं था काम मुझे फिर भी था कितना काम उन गलियों में फिरते रहना दिन को करना शाम घर घर मेरे शे'र के चर्चे घर घर में बदनाम रातों को दहलीज़ों पे ही कर लेना आराम दुख सहने में चुप रहने में दिल था कितना शाद लायल-पूर इक शहर है जिस में दिल है मिरा आबाद मैं ने उस नगरी रह कर क्या क्या गीत लिखे जिन के कारन लोगों के मन में है मेरी प्रीत एक लगन की बात है जीवन कैसी हार और जीत सब से मुझ को प्यार है 'जालिब' सब हैं मेरे मीत दाद तो उन की याद है मुझ को भूल गया बे-दाद लायल पूर इक शहर है जिस में दिल है मिरा आबाद — Habib Jalib
तेरे लिए में क्या क्या सद में सहता हूँ संगीनों के राज में भी सच कहता हूँ मेरी राह में मस्लहतों के फूल भी हैं तेरी ख़ातिर काँटे चुनता रहूँगा तू आएगा उसी आस पे झूम रहा है दिल देख ऐ मुस्तक़बिल इक इक कर के सारे साथी छोड़ गए मुझ से मेरे रहबर भी मुँह मोड़ गए सोचता हूँ बे-कार गिला है ग़ैरों का अपने ही जब प्यार का नाता तोड़ गए तेरे भी दुश्मन हैं मेरे ख़्वाबों के क़ातिल देख ऐ मुस्तक़बिल जहाँ के आगे सर न झुकाया मैं ने कभी सिफ़लों को अपना न बनाया मैं ने कभी दौलत और ओहदों के बल पर जो ऐंठें उन लोगों को मुँह न लगाया मैं ने कभी मैं ने चोर कहा चोरों को खुल के सर-ए-महफ़िल देख ऐ मुस्तक़बिल ज़ुल्फ़ की बात किए जाते हैं दिन को यूँँ रात किए जाते हैं चंद आँसू हैं उन्हें भी 'जालिब' नज़र हालात किए जाते हैं — Habib Jalib