मीर'-ओ-'ग़ालिब' बने 'यगाना' बने
आदमी ऐ ख़ुदा ख़ुदा न बने
मौत की दस्तरस में कब से हैं
ज़िंदगी का कोई बहाना बने
अपना शायद यही था जुर्म ऐ दोस्त
बा-वफ़ा बन के बे-वफ़ा न बने
हम पे इक ए'तिराज़ ये भी है
बे-नवा हो के बे-नवा न बने
ये भी अपना क़ुसूर क्या कम है
किसी क़ातिल के हम-नवा न बने
— Habib Jalib














