SHIV SAFAR

SHIV SAFAR

@ShivSafar

SHIV SAFAR shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in SHIV SAFAR's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

9

Content

192

Likes

148

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

Sher

अब मुझे हक़ तो नहीं पर इतना बोलूँगा ज़रूर जा रहे तो लौट आओ जा चुके तो अलविदा — SHIV SAFAR
सोचा था कि इस साल तो मिल जाएगी राहत अफ़सोस कि इस साल भी जीना ही पड़ेगा — SHIV SAFAR
जब ख़ुदा हो जाए क़ातिल-यार तो सज्दे की ख़ातिर ख़ून से अपने वुज़ू करना कहाँ से कुफ़्र होगा — SHIV SAFAR
दिल से उस की तस्वीर हटाऊँ भी कैसे ख़ाली कमरे की वहशत से मैं वाक़िफ़ हूँ — SHIV SAFAR
हर किसी में नज़र मुझ को तू आ रही सब को अब चाहना मेरी मजबूरी है — SHIV SAFAR
वो अब मेरा नहीं ये मानना आसाँ यूँँ हो जाए बराबर एक्स के कुछ मान लेना जितना आसाँ था — SHIV SAFAR
ख़ुशियाँ तो क्या ही देंगी मसर्रात के सिवा ग़म से मिलो वो देगा तजर्बे नए नए — SHIV SAFAR
क्या थी ज़रूरत पूरी कहानी कहने की इश्क़ ही कह देते तो भी मैं रो देता — SHIV SAFAR
कौन कहता है कि लिखने के लिए पढ़ते हैं सब पढ़ते हैं ताकि लिखा है जो लिखा जाए न फिर — SHIV SAFAR
तुझे हासिल तो कर सकता हूँ लेकिन मुहब्बत करने में ज़्यादा मज़ा है — SHIV SAFAR
लिबास जैसे मुसाफ़िर बदलता रहता है किसी सफ़र पे कभी ए'तिबार मत करना — SHIV SAFAR
घर वालों के कहने पे तर्क-ए-शायरी करूँ या'नी पहले जान अपनी लूॅं तब नौकरी करूँ — SHIV SAFAR
कहें गर दोस्त उस को दोस्ती जिस ने निभाई हो तो मेरे ग़म तुझे इस फ्रेंडशिप डे की बधाई हो — SHIV SAFAR
मेरी साँसें ये नहीं अब जैसे कोई आह हुई तेरी याद आई मेरी ज़िंदगी तबाह हुई — SHIV SAFAR
जिस को लतीफ़ा जान के हॅंसती है रोज़ वो मेरी ग़ज़ल का सब सेे जिगर-चाक शे'र है — SHIV SAFAR
शख़्स अगर कोई होता तो कब का ठुकरा देता मैं लेकिन मेरा दिल ही मेरे दिल को रोज़ दुखाता है — SHIV SAFAR
मुझ को कुछ और दिन है मरना अभी मैं अभी और जीने वाला हूँ — SHIV SAFAR

Ghazal

हुआ हूँ जब से मैं बीमार है ये डर मुझ को कहीं न करने लगे अब दवा असर मुझ को ये सोच कर ही कई शब मैं सो नहीं पाया वो जागती भी कभी होगी सोच कर मुझ को उसे लगे न मुझे ग़म है उस के जाने का सो कहना होगा ये पहले से थी ख़बर मुझ को अब इस सेे ज़्यादा पराया मैं ख़ुद को क्या समझूँ कि याद आने लगा है ख़ुद अपना घर मुझ को ये मेरा दावा है मैं और याद आऊँगा न हो यक़ीन तो फिर देखो छोड़ कर मुझ को अजब सितम है जिस को आज हँस के टाल दिया रुलाने वाली है वो बात उम्र भर मुझ को ये मंज़िलें तो मुसाफ़िर बिगाड़ देती हैं है शुक्रिया कि सँभाले है ये सफ़र मुझ को — SHIV SAFAR
दहल जाता है दिल क्यूँँ आइने से कभी पूछो किसी बहरूपिए से हुआ इंसाफ़ गर इस फ़ैसले से तो फिर क्यूँँ आह उट्ठी कटघरे से किताबों से नहीं जो भूल जाऊँ जो कुछ सीखा है सीखा तजरबे से समुंदर रोक पाएगा कहाँ तक किसी टूटे हुए को डूबने से निशाँ है प्यार का या सतवतों का ये कैसी बू है आती मक़बरे से अज़ीज़ों से मिला धोका तो जाना खिसकती है ज़मीं पैरों तले से हमेशा दौड़ कर मुमकिन नहीं है कि मिलती भी है मंज़िल रेंगने से शिकायत क्या करें अब फ़ासलों की हमीं कहने गए थे तीसरे से किसी के पाँव या लब तुम बताओ ये रूखे होंठ हैं क्या चूमने से सफ़र कोई नया थोड़ी है यारो ये ग़म मुझ में है सन चौरान्वे से — SHIV SAFAR
सब हसरत-ओ-मुराद का मुँह बंद कर दिया लो मैं ने हर फ़साद का मुँह बंद कर दिया वरना तो ये ज़रर भी भटकता मेरी तरह अच्छा हुआ मफ़ाद का मुँह बंद कर दिया देखा उसे किसी को दु'आओं में माँगते फिर अपनी ही मुराद का मुँह बंद कर दिया तेरे दिए ख़तों को दबा कर किताब में जा मैं ने तेरी याद का मुँह बंद कर दिया धोका फ़रेब झूठ के तकिए के ज़ोर से लोगों ने एतिमाद का मुँह बंद कर दिया आज़ाद ज़िंदगी को किया ओढ़ के क़फ़न यूँँ मैं ने हर फ़साद का मुँह बंद कर दिया ये मेरी होशियारी थी जो इश्क़ देख कर झट से दिल-ए-कुशाद का मुँह बंद कर दिया उस ने भवों से कर के शरारत इशारों में मुझ जैसे कज-निहाद का मुँह बंद कर दिया है कौन उस की याद का रुख़ जो बदल रहा क्यूँँ मेरी जायदाद का मुँह बंद कर दिया वो राज़ खोल दे न ‘सफ़र’ के कहीं सभी सो उस सफ़र-नज़ाद का मुँह बंद कर दिया — SHIV SAFAR
इस लिए शब सो नहीं पाता हूँ मैं दिन में खुल के रो नहीं पाता हूँ मैं मिल ही जाता हूँ मैं ख़ुद को भीड़ में चाह कर भी खो नहीं पाता हूँ मैं ज़िंदगी के ग़म बहुत हल्के हैं दोस्त ख़ुशियाँ हैं जो ढो नहीं पाता हूँ मैं है पड़ी बंजर ख़यालों की ज़मीं इस लिए कुछ बो नहीं पाता हूँ मैं ख़ून धुल जाते हैं पर अश्कों के दाग़ लाख चाहूॅं धो नहीं पाता हूँ मैं आख़िरश होता है क्या उस ख़्वाब का देख कर भी जो नहीं पाता हूँ मैं रोज़ उठ के ज़िक्र-ए-हक़ करता हूँ मैं सिर्फ़ ज़िंदा हो नहीं पाता हूँ मैं इस ‘सफ़र’ में मोड़ बन जाता है फिर शख़्स वो जिस को नहीं पाता हूँ मैं — SHIV SAFAR
है बस इस जिस्म को साँसों का कब्रिस्तान करना बहुत मुश्किल नहीं होता है ग़म आसान करना बहुत से दिल जगह देने को थे तैयार मुझ को प मैं ने ही न चाहा ज़ीस्त को ज़िंदान करना वफ़ा को तुम जहाँ में ढूँढ़ते फिरते हो क्यूँँकर कभी मौक़ा मिले तो ख़ुद से भी पहचान करना मैं ख़बरें ख़ुद-कुशी की सुन के था हैरत में लेकिन हुआ जब इश्क़ तो आसाँ लगा हैरान करना सुकूँ से देख लो पहले मुझे तुम राख बनते फिर उस के बा'द तुम अपनी ख़ुशी ऐलान करना लगा के सीने से नेज़ा बढ़ा के दिल की जानिब हमें आता है अपने आप पर एहसान करना फ़क़त दुनिया से तेरी दिल लगी जाइज़ नहीं है हमारे वास्ते भी मौत के इम्कान कर ना कभी तुझ को लगे गर प्यार मैं ने कम दिया है तो फिर तेरे दिए ज़ख़्मों को तू मीज़ान करना सुकूँ आराम जैसी शय मुझे मिलती भी कैसे ‘सफ़र’ होने का मतलब ख़ुद को है हल्कान करना — SHIV SAFAR
मौत ने फ़ुरसत निकाली है अभी ग़म से राहत मिलने वाली है अभी जो दिलाई थी किताबें बेच कर उस के कानों में वो बाली है अभी कल वो हो जाएगी इक बाज़-ए-वक़ार ख़्वार की चिड़िया जो पाली है अभी आके वो ज़ख़्मों से दिल भर जाएगा लाख बेहतर है कि ख़ाली है अभी आओ यारो तुम भी थोड़ा ज़ोर दो इश्क़ की गर्दन दबा ली है अभी दाग़ बनने में अभी कुछ वक़्त है मैं ने जो उम्मीद पाली है अभी मिल गया इक शख़्स मुझ सेा हू-ब-हू जिस्म की ख़ल्वत खँगाली है अभी अब नहीं कुछ हाजते-दारो-रसन राह इक ऐसी निकाली है अभी इन थके हाथों की जुंबिश कह रही मेरे हिस्से में भी ताली है अभी कल वो फिर कोई बहाने आएगी चरासाजी से जो टाली है अभी चाहिए हर रंग की बेगम मुझे वैसे गोरी और काली है अभी जल रहे हैं सोज़िश-ए-मंज़र से पाँव गो 'सफ़र' सारा ख़याली है अभी — SHIV SAFAR
हाथ अपना जाते जाते कुछ यूँँ झुमा रहा था जैसे सदा की ख़ातिर वो दूर जा रहा था होते ही सुब्ह मुझ सेे माँ पूछने लगी है कल ख़्वाब में तू रो के किस को बुला रहा था पहली दफ़ा वो अपने मिलने पे सोचता हूँ क्या मुझ को हो गया था क्यूँँ मुस्कुरा रहा था हम दोनों के मुकम्मल मंसूबे हो न पाए मैं प्यार कर रहा था वो आज़मा रहा था मैं जानता हूँ तुम को तुम दूध के धुले हो वो मैं था जो ख़ुद अपने दिल को दुखा रहा था अब मान जाता हूँ मैं माज़ी को याद कर के वर्ना किसी से मैं भी बरसों ख़फ़ा रहा था अब थक गया हूँ सच है लेकिन हाँ सच है ये भी जी जान मैं लगा के उस को भुला रहा था कुछ चार साल से ये सूरत है बद-दुआ सी वर्ना किसी के दिल की मैं भी दुआ रहा था कल शब मुशा'इरे में रोने लगा ‘सफ़र’ क्यूँँ जो भी हो वजह हम को तो लुत्फ़ आ रहा था — SHIV SAFAR
सुकूँ है और हूँ आबाद फिर मैं ये कैसी पा रहा हूँ दाद फिर मैं तलाशी आज तक जारी है मेरी नज़र आया न तेरे बा'द फिर मैं हुकूमत आज भी उस की है मुझ पे कि सोती है ये पहले याद फिर मैं मुहब्बत फिर मुझे रास आ रही है या होने को हूँ अब बर्बाद फिर मैं मेरे हाथों में दम तोड़ा था उस ने किए जाता हूँ क्यूँँ फ़रियाद फिर मैं परिंदे ख़त्म हो जाएँगे इक दिन ये सुन कर कह पड़ा सय्याद फिर मैं सो इक दिन इश्क़ से टकरा गया और सदा रहने लगा नाशाद फिर मैं जो बन पाऊँ तेरी बाहों का क़ैदी तो ख़ुद को मान लूँ आज़ाद फिर मैं जो दिल तू छोड़ देगा साथ मेरा सुनाऊँगा किसे रूदाद फिर मैं सफ़र का आख़िरी मोड़ आ गया है न कर पाऊँगा अब इरशाद फिर मैं — SHIV SAFAR
दिल में यूँँ इक पीर छिपाए बैठा हूँ जैसे इक जागीर छिपाए बैठा हूँ बच्चों की मुठ्ठी में गुड़ के जैसे ही मैं उस की तस्वीर छिपाए बैठा हूँ मैं ख़ामोश हूँ या'नी अपने सीने में बात कोई गंभीर छिपाए बैठा हूँ राँझा नाम से फोन में रखके इक नंबर मैं भी अपनी हीर छिपाए बैठा हूँ माँ का साया उठ जाने के बा'द अपनी रब से भी तक़दीर छिपाए बैठा हूँ उस की ख़िदमत में पहने इस चोग़े से पैरों की ज़ंजीर छिपाए बैठा हूँ सुब्ह हुई पर आँख नहीं खोली या'नी ख़्वाबों की ता'बीर छिपाए बैठा हूँ हर इक पर है नक़्श मेरे ही अपनों का दिल में जितने तीर छिपाए बैठा हूँ झूठ सफ़र है अस्ल तो अपने शे'रों में ग़ालिब मोमिन मीर छिपाए बैठा हूँ — SHIV SAFAR
ग़म को मेरे सौ गुना करते हैं टुकड़े काँच के मैं ने यूँँ दिल में सजा रक्खे हैं टुकड़े काँच के आइने सी एक लड़की ख़्वाब में आती है जब सुब्ह मेरी आँख से झड़ते हैं टुकड़े काँच के जिन की मुझ सेे हैसियत आँखें मिलाने की न थी पाँव के नीचे मेरे बन के हैं टुकड़े काँच के लौट जाती हैं मेरी चौखट से ही तन्हाईयाँ साथ कमरे में मेरे रहते हैं टुकड़े काँच के फिर मुहब्बत गर हुई तो टूट कर मत चाहना ख़ूँ के बदले दिल से बह सकते हैं टुकड़े काँच के भूल बैठा हूँ कहीं पे लिख के नंबर अपनों का पूछना था ये कि अब कैसे हैं टुकड़े काँच के एक दिन होता है अपनी असलियत से सामना लोग फिर ग़ुस्से में कर देते हैं टुकड़े काँच के हँसने की ज़हमत न करना टूटने पर तुम मेरे मुझ पे हँसने के लिए बैठे हैं टुकड़े काँच के चल नहीं पाओगे मेरे साथ तुम ऐ गुल-बदन इस ‘सफ़र’ में जा-ब-जा बिखरे हैं टुकड़े काँच के — SHIV SAFAR
क़ाबिल तो हो गया तुझे हासिल न हो सका या'नी कि जिस्म रह गया मैं दिल न हो सका इक वो फ़क़त नज़र से ही करते हैं क़त्ल-ए-'आम याँ मैं कमाँ भी खींच के क़ातिल न हो सका शब भर ग़ज़ल की चाह में टहला हूँ बाम पर कम्बख़्त एक शे'र भी नाज़िल न हो सका अब सर ही फोड़ ग़ैरों के दीवार-ए-दिल से तू जब अपनी दिल-शिगाफ़ी का क़ाइल न हो सका सोचा था अब यही है एक रास्ता मगर मर के भी उस की याद में शामिल न हो सका पहुँचा मुहब्बतें कमा के जब सुख़न से घर दर कह के रो पड़ा कि मैं क़ाबिल न हो सका मतलब उस एक शख़्स से सच मुच का इश्क़ था शायद तभी ही वो मुझे हासिल न हो सका अब तन्हा हूँ तो आया है ठोकर में मेरी संग हिजरत को जा रहा था तो हाइल न हो सका तेरे सुख़न-शनास का क्या फ़ाइदा मैं गर तेरी निगाह-ए-नाज़ के क़ाबिल न हो सका मुझ पे पड़ा यूँँ मेरे तख़ल्लुस का कुछ असर आख़िर ‘सफ़र’ ही रह गया मंज़िल न हो सका — SHIV SAFAR
मौज-ए-शादाँ में ग़मों की तिश्नगी कैसे रहे या'नी ख़ुश-कामी की ज़द में शा'इरी कैसे रहे तुम तो मुझ में रह कहीं लोगे इन आँखों के सिवा पर कहीं भी मेरी आँखों की नमी कैसे रहे देख मैं भी हूँ सुख़न-वर और तू भी इस लिए अपने जैसों की किसी से दोस्ती कैसे रहे हम भले इक दूजे से रह लें जुदा होकर मगर ज़िंदगी से ग़म ग़मों से ज़िंदगी कैसे रहे साँस लेना शे'र कहना सब तो मुमकिन है मगर टूटने के बा'द दिल ज़िंदा कोई कैसे रहे आशिक़ी से दूर आशिक़ रह लें डर से बाप के दूर लेकिन आशिक़ों से आशिक़ी कैसे रहे जब तलक हैं क़ैद तेरे शौक़-ए-दीद-ए-हुस्न में तेरे दीवानों को मरज़-ए-मयकशी कैसे रहे आग पानी की तरह है राब्ता इन में ‘सफ़र’ एक ही सीने में उलफ़त और ख़ुशी कैसे रहे — SHIV SAFAR
खुरच के देख लो तुम सिर्फ़ ख़ार निकलेगा मेरे बदन से उसी का ग़ुबार निकलेगा नसें निचोड़ लो चाहे यक़ीं जो हो न तुम्हें मेरी रगों से वो ही बे-शुमार निकलेगा मरीज़-ए-इश्क़ हूँ मुझ पे न जाँच ज़ाया' करो कमी न कोई, न कोई बुख़ार निकलेगा न कोई अक्स न चेहरा न कोई सुब्ह-ए-वस्ल इन आँखों में तो फ़क़त इंतिज़ार निकलेगा कभी उधेड़ना तुरपाईयाँ बदन की मेरे मुझी से रब्त मेरा तार तार निकलेगा न तख़्त-ओ-ताज कोई और न कोह-ए-नूर कोई कि मैं हूँ शाह वो सर जिस के बार निकलेगा अगर समझ गए हाथों के काँपने का सबब हर इक शिकारी में भी इक शिकार निकलेगा तेरे सताए हुए वहशियों के सीनों में न कुछ भी निकला तो इक ग़म-गुसार निकलेगा किसी पे हक़ वो जताए, न ये उमीद करो 'सफ़र' तो ख़ुद से भी बे-इख़्तियार निकलेगा — SHIV SAFAR
मिलूँगा अब की तो तुझ में क़याम कर लूँगा डुबो के ख़ुद को तुझे अपनी शाम कर लूँगा बना के बा'इस-ए-ईज़ा में सब सेे ख़ास तुझे वुफ़ूर-ए-गिर्या में ख़ुद को मैं आम कर लूँगा बढ़ेगी माँग तो कर लूँगा इस्म-ए-जिन्स तुझे गिरेगा मोल तो मैं ख़ुद को दाम कर लूँगा न आएगा तो मैं भी पूछने न जाऊँगा मगर जो आया तो बेशक सलाम कर लूँगा उसे ये कह दो कि अपनी दुआ न ज़ाया' करे मैं अपनी मौत का ख़ुद इंतिज़ाम कर लूँगा अगरचे बिखरा है सामाँ तो बिखरा रहने दो मैं अपने कमरे का ख़ुद ही निज़ाम कर लूँगा मुशीर-ख़ास तू बन के तो देख मेरे लिए मैं तेरे वास्ते ख़ुद को अवाम कर लूँगा तरीक़-ए-कार सही हो या फिर न हो मेरा मगर यक़ीं है कि इक दिन मैं नाम कर लूँगा जिगर से अश्क बहाते हुए जो हँसना हुआ बस इक ‘सफ़र’ ने कहा मैं ये काम कर लूँगा — SHIV SAFAR
क्या पता था मसअला यूँँ हल मेरा हो जाएगा कू-ए-जानाँ एक दिन मक़्तल मेरा हो जाएगा इस क़दर कुचला है सबने खूँ निकलने तक मुझे अब तो लगता है ये दिल दलदल मेरा हो जाएगा 'इत्र-बीज़ी की ज़रूरत आप को होगी जनाब वो फ़क़त छू दे बदन संदल मेरा हो जाएगा पहले केवल शक ही था पर इश्क़ कर के तय है ये नाम मरने वालों में अव्वल मेरा हो जाएगा जुस्तुजू में तेरी यूँँ भटका हूँ सहरा में कि अब और दो पग चल दूँ तो जंगल मेरा हो जाएगा बहस में क्यूँँ साथ तेरे वक़्त मैं ज़ाया' करूँँ आज बेशक है तेरा पर कल मेरा हो जाएगा मत नुमाइश हुस्न की करना ‘सफ़र’ के सामने ख़ुद ही वो कहता है मन चंचल मेरा हो जाएगा — SHIV SAFAR
फ़लक के पास तेरे आ गया हूँ उचक के पास तेरे आ गया हूँ मैं काली गीट तू कैरम की है क़्वीन सरक के पास तेरे आ गया हूँ तू है शतरंज की रानी मैं प्यादा मटक के पास तेरे आ गया हूँ शज़र पे आम तू और मैं हूँ बन्दर लपक के पास तेरे आ गया हूँ दिखा हो घोंसला पंछी को जैसे चहक के पास तेरे आ गया हूँ पता था साँप है सीढ़ी नहीं तू बहक के पास तेरे आ गया हूँ बचा लेगा तू सो दुनिया को गाली मैं बक के पास तेरे आ गया हूँ हिरण तू, मैं हरे पत्तों की डाली लचक के पास तेरे आ गया हूँ जवाँ लड़का मैं, तू सिगरेट की है लत भटक के पास तेरे आ गया हूँ खुले बालों में उड़ के पंखुड़ी सी अटक के पास तेरे आ गया हूँ तू नग़्मा है, मैं रक़्क़ासा का हूँ पैर थिरक के पास तेरे आ गया हूँ तू बचपन सी, मैं गोलू मोलू सा गेंद ढरक के पास तेरे आ गया हूँ तू दुल्हन, मैं तेरे हाथों की चूड़ी खनक के पास तेरे आ गया हूँ वो पैमाने वो ज़िद विद दोस्तों के पटक के पास तेरे आ गया हूँ पकड़ रक्खी थी दुनिया हाथ लेकिन झटक के पास तेरे आ गया हूँ ‘सफ़र’ तुझ सा मिला कोई न अच्छा सो थक के पास तेरे आ गया हूँ — SHIV SAFAR

Nazm

“आख़िरी बात” हमारे मिलने पे ख़ुश था प तेरी बात मुझे चुभी है यूँँ, कोई शायद कभी चुभी होगी न जाने क्यूँँ ही मगर तू ने कैसे बोल दिया कि आज बात हमारी ये आख़िरी होगी अगर तेरी है ख़ुशी इस में तो यही होगा पर अंत में जो कह रहा हूँ मैं वही होगा कि..... भले मैं ख़ुद न रहूँ तुझ से बोलने के लिए भले तू सुनने को मौजूद हो न हो कल को भले मैं ख़ुद ही किन्हीं मुश्किलों में उलझा रहूँ भले न वक़्त तेरे पास ही हो इक पल को भले ये आज से हालात कल रहें न रहें भले ही कल को ये फ़ुर्सत के पल रहें न रहें भले ज़माना हमें फिर कभी न मिलने दे भले दिलों में हमारे न इश्क़ खिलने दे भले ही कल को तेरे रास्ते हो जाएँ जुदा भले मैं ख़ुद ही किसी और सफ़र पर चल दूँ भले तू बात न करने का फ़ैसला कर ले भले मैं ख़ुद भी ख़फ़ा रहने की क़सम ले लूँ मगर ये बात मेरी याद हमेशा रखना अगर हमारे जुनूँ में कमी नहीं होगी तो आज अपनी मुलाक़ात आख़िरी हो मगर हमारी बात कभी आख़िरी नहीं होगी — SHIV SAFAR
“ऐ मेरे दिल” तुझे जीना था लेकिन मर गया है मुझे मरना था लेकिन जी रहा हूँ ऐ मेरे दिल तेरी मय्यत पे अब मैं शराब-ए-ग़म ख़ुशी से पी रहा हूँ बिना मुझ सेे कहे तन्हा अकेले बहुत से हादसे तू ने हैं झेले हुई हैं लाख आँखें मेरी नम पर दिया बस साथ तू ने हर क़दम पर करूँँॅं मैं शुक्रिया जितनी दफ़ा भी रहेगा तेरे एहसानों से कम ही तू तो आज़ाद ग़म से हो गया है मगर इक दोस्त मैं ने खो दिया है तू कर आने का वापस वा'दा मुझ से कि अगले ज़न्म फिर दिल मेरा बन के मेरा मन है कि खुल के रोऊँ लेकिन बड़ी मुश्किल से लब को सी रहा हूँ ऐ मेरे दिल तेरी मय्यत पे अब मैं शराब-ए-ग़म ख़ुशी से पी रहा हूँ कोई इल्ज़ाम अब किसपर धरुँगा मैं किस के साथ रातों में बहूँगा मेरी मानो मैं सब सच कह रहा हूँ ये किस का वास्ता देकर कहूँगा बहुत सी झूठी क़स में तेरी खाया तुझे हर बार सूली पर चढ़ाया किया है मैं ने इस्ते'माल तेरा मुझे जब जैसे जितना जी में आया हो मुमकिन तो मेरा इंसाफ़ कर दे ऐ मेरे दिल मुझे तू माफ़ कर दे तुझे ग़म देने वाले मुजरिमों में मुझे अफ़सोस है मैं भी रहा हूँ ऐ मेरे दिल तेरी मय्यत पे अब मैं शराब-ए-ग़म ख़ुशी से पी रहा हूँ — SHIV SAFAR
“तजर्बा” बिछड़ते वक़्त अपने प्यार का इज़हार करना हो या फिर उस सेे बिछड़ कर और ज़्यादा प्यार करना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है अगर घर वालों के आगे हो ख़ुश ऐसा जताना हो या माँ के पूछने पर ग़म सफ़ाई से छिपाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कभी याद आने पर उस के तुझे नज़रें चुराना हो या शब को याद करना और दिन में भूल जाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी के पूछने पर हर दफ़ा इनकार करना हो या फिर तन्हाई में गर याद उसे हर बार करना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है अगर यारों के आगे दिल से तुझ को सख़्त होना हो या फिर इक दोस्त के कंधे प सर रख ख़ूब रोना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी के साथ उस ने ज़िंदगी अपनी बसा ली हो या फिर तू ने उसे ही ज़िंदगी अपनी बना ली हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है हो मन में और कुछ लेकिन उसे कुछ और बताना हो या दिल में दर्द हो लेकिन लबों से मुस्कुराना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी महफ़िल में उस के वास्ते पहचान बनना हो या उस का नाम आते ही तुझे अनजान बनना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है न उस के पास तेरी कोई भी पिछली निशानी हो मगर फिर भी वो तुझ को याद बिल्कुल मुँह-ज़बानी हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कि उस के ग़म में उस के साथ मीलों दूर जाना हो या फिर उस की ख़ुशी ख़ातिर क़दम पीछे हटाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कि उस को जानने के वास्ते कुछ झूठ कहना हो या सब सच जानने के बा'द भी ख़ामोश रहना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कुछ इक लम्हों में पूरी ज़िंदगी की मौज पानी हो या पूरी ज़िंदगी कुछ लम्हों के ज़द में बितानी हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है बग़ैर उस के कोई लम्हा कभी जीया न जाता हो या उस के साथ रहना ही फ़क़त इक फ़र्ज़ जैसा हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है उसे बस में बिठा के घर तक उस को छोड़ आना हो या उस की बस निकल जाने पे पीछे छूट जाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है नहीं अब वो तेरा ये जानकर भी साथ देना हो या फिर इक फ़ैसला तन्हा यूँॅं ही रहने का लेना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है — SHIV SAFAR
“बस यही एक सच है” बस यही एक सच है बता दो उसे उस सेे नफ़रत है मुझ को ये जुमला नहीं क्यूँ मुझे फ़िक्र हो उस के मुस्कान की जब उसे मेरी ख़ुशियों की परवा नहीं क्यूँ बताऊॅं उसे याद करता हूँ मैं क्या उसे मैं कभी याद आता नहीं मेरी ख़ातिर किया हो कभी उस ने कुछ एक पल ऐसा भी याद आता नहीं अपनी यादें वो ले जाए या जाँ मेरी एक पल भी जिया मुझ सेे जाता नहीं नाम भी उस का अब तो है चुभता मुझे कोई जा कर उसे क्यूँ बताता नहीं पढ़ता है वो अगर मेरे नज़्मों को तो क्या नज़र मेरा हाल उस को आता नहीं गर नज़र उस को आती है हालत मेरी तो भला लौट कर क्यूँ वो आता नहीं इंतिज़ार अब करूँ क्यूँ भला उस का मैं जब कि अब राह मेरी वो तकता नहीं क्यूँ मुझे फ़िक्र हो उस के मुस्कान की जब उसे मेरी ख़ुशियों की परवा नहीं बस यही एक सच है बता दो उसे — SHIV SAFAR
“दिल बेचारा” आज भी याद उसे करता है दिल बेचारा आह क्यूँ उस के लिए भरता है दिल बेचारा सारी तकलीफ़ ये तन्हा ही उठा लेता है पर न ये शिकवा गिला करता है दिल बेचारा ये न सोचो कि इसे मर्ज़ नहीं होता है बात यूँॅं है कि ये ख़ुद-ग़र्ज़ नहीं होता है बाँटने में ख़ुशी क्या क्या नहीं झेला इसने पर शिकायत न कभी करता है दिल बेचारा आज भी याद उसे करता है दिल बेचारा तुम न समझे हो न समझोगे कभी भी इस को क्यूँ न होता है कभी दर्द कोई भी इस को बात अपनों की हो या हो किसी बेगाने की फ़र्क दोनों में नहीं करता है दिल बेचारा आज भी याद उसे करता है दिल बेचारा क्या निभा सकता है इस जैसा भी वा'दा कोई होगा ज़िद्दी भी नहीं इस सेे ज़ियादा कोई जो अगर ठान ले करना है किसी को अपना फिर जहाँ से भी नहीं डरता है दिल बेचारा आज भी याद उसे करता है दिल बेचारा — SHIV SAFAR
“मौसम ये बरसात का” आसमाँ से ज़मीं की मुलाक़ात का देखो आया है मौसम ये बरसात का नन्हें बच्चों के पैरों की छप छप कभी तो कभी गिरती बूॅंदों की टप टप कहीं देख कर ये अनोखा नज़ारा यहाँ आज झूमा न हो ऐसा कोई नहीं गीली मिट्टी की ख़ुशबू लिए अपने संग दिन भी आया है ख़ुशियों के सौगात का आसमाँ से ज़मीं की मुलाक़ात का देखो आया है मौसम ये बरसात का बादलों में झगड़ती हुई बिजलियाँ ये फुहारे हैं उड़ती हुई तितलियाँ आज धरती को बूँदें हैं यूँॅं छू रही मानो करती हो अंबर की कुछ चुगलियाँ छाया है अब कहीं पर ख़ुशी का समाँ तो कहीं पर है माहौल आपात का आसमाँ से ज़मीं की मुलाक़ात का देखो आया है मौसम ये बरसात का — SHIV SAFAR
“ग़म का क्या करूँ” बरसों पुराने ज़ख़्म पे मरहम का क्या करूँ ये साल तो नया है मगर ग़म का क्या करूँ या तो कोई नई सी दवा दो बता मुझे या फिर नया सा ज़ख़्म ही कर दो अता मुझे इस ज़िन्दगी को ख़त्म किया भी न जा रहा ज़िंदा तो हूँ मगर यूँॅं जिया भी न जा रहा अब और साँस मुझ सेे लिया भी न जा रहा जीने का अब दिखावा किया भी न जा रहा ऐसा करो कि पीछे छूट जाए ग़म मेरा या फिर करो ऐसा की टूट जाए दम मेरा इस बार मेरे दर्द को बरकत भी चाहिए मशहूर हो सके इसे ज़िल्लत भी चाहिए इस को दर–ओ–दीवार नया छत भी चाहिए जर्जर ये हो गया है मरम्मत भी चाहिए तुम शौक़ से मनाओ नए साल की ख़ुशी मुझ को ये सोचने दो कि इस ग़म का क्या करूँ बरसों पुराने ज़ख़्म पे मरहम का क्या करूँ ये साल तो नया है मगर ग़म का क्या करूँ — SHIV SAFAR
“पहली मुलाक़ात” मैं पहली बार जब तुम सेे मिलूँगा कहूँगा क्या मैं अक्सर सोचता हूँ मिलूँगा मैं किसी अनजान जैसे या फिर जन्मों की हो पहचान जैसे मैं पहली बार जब देखूँगा तुम को यक़ीं कैसे दिलाऊँगा मैं ख़ुद को कि जिस के ख़्वाब अब तक देखता था हक़ीक़त में वो मेरे सामने है कहीं मैं सोचता ही रह न जाऊँ कि रब ने की ये रहमत किस लिए है वो पहली बार जब नज़रें मिलेंगी मेरी आँखें ख़ुशी से झूम उठेंगी वो पहला लफ़्ज़ क्या बोलूँगा तुम को वो पहला तोहफ़ा मैं क्या दूँगा तुम को वो पहली बार हाथों का पकड़ना तुम्हें बाहों में पहली बार भरना ये सब है वहम मेरा मानता हूँ मेरा हक़ मैं बख़ूबी जानता हूँ मैं फिर भी हक़ से बढ़कर सोचता हूँ कहूँगा क्या मैं अक्सर सोचता हूँ मैं पहली बार जब तुम सेे मिलूँगा तुम्हें मिलने की दिल में आस ले के ये मौसम सारे बीते जा रहे हैं यक़ीं होगा न लेकिन वक़्त मुझ सेे बड़ी मुश्किल से काटे जा रहे हैं मगर तब तक मैं अपनी मुट्ठियों में ये सारे मौसमों को भर रहा हूँ तुम्हें मिल कर जो पहली चीज़ दूँगा वो इक तैयार तोहफ़ा कर रहा हूँ ये लू गर्मी की ये जाड़े की ठंडक ये मंदिर के भजन ये जलते दीपक हवाएँ सुब्ह की, बारिश की बूँदें सुनहरी ओस ये सूरज की किरनें सुहानी शाम, गंगा के किनारे ये नीले आसमाँ के चाँद तारे ये सावन और ये पतझड़ की रंगत क्षितिज पर सात रंगों की ये संगत सभी को भर के मन की चिट्ठियों में मैं ले आऊँगा अपनी मुट्ठियों में कहोगी तुम कि नामुमकिन है ये सब ये लड़का इतना पागल हो गया कब मैं ख़ुद भी सोचता हूँ सच कहूँ तो कि इतना भी मैं क्यूँँकर सोचता हूँ कहूँगा क्या मैं अक्सर सोचता हूँ मैं पहली बार जब तुम सेे मिलूँगा — SHIV SAFAR
"मय्यत” मुझे मालूम है तन्हा कोई छोड़े तो क्या होगा कोई अपना अगर बाँहों में दम तोड़े तो क्या होगा उसी इक पल में मानो उम्र सारी बीत जाती है हमारे आगे बैठी मौत हम पे मुस्कुराती है समझ उस पल नहीं आता कि रोएँ या कि साँसें लें या उन की लाश पर ही सर पटक कर हम भी जाँ दे दें ख़ुदा के आगे घुटने टेक कर हम गिड़गिड़ाते हैं कि अपना वास्ता देकर उन्हें वापस बुलाते हैं मगर उस रब के कानों तक न चीख़ें अपनी जाती हैं किसी बादल से टकरा कर दुआएँ लौट आती हैं हमें उस वक़्त भी ये ज़िंदगी क्या ख़ूब ठगती है न आँसू सूख भी पाते कि मय्यत उठने लगती है ये बस कहने की बातें है कि दुनिया छोड़ जाते हैं वो बनकर याद सीने में बराबर जाते आते हैं न मिट्टी में गड़े रहते न नदियों में वो बहते हैं है सच तो ये हमेशा से हमी में दफ़्न रहते हैं अगर ख़ुद मौत से रिश्ता कोई जोड़े तो क्या होगा कोई अपना अगर बाहों में दम तोड़े तो क्या होगा मुझे मालूम है तन्हा कोई छोड़े तो क्या होगा — SHIV SAFAR
“अब तू नहीं” अब मेरे पास तू नहीं रहती तेरी यादों ने घेर रक्खा है इस भरोसे पे मैं भी बैठा था अब मेरी पूरी आरज़ू होगी मेरी जानिब को मुस्कुराती हुई तेरी यादों के पीछे तू होगी मैं बहुत देर तक था बैठा रहा अब्र छाने लगे थे आँखों पे ग़ौर ख़ुद पर किया तो क्या पाया मेरी आँखों में चंद आँसू थे यादें मुझ को रुला के चल भी गईं और मुझ को ख़बर हुई ही नहीं बावजूद इस के मैं वहीं बैठा था जाने अब मुझ को देखना क्या था मैं ख़यालों से होश में जब आया ख़ुद को फिर से मैं तन्हा ही पाया कल तू फिर याद मुझ को आएगी फिर मैं उम्मीद ले के बैठूँगा कल रुलाएँगी फिर तेरी यादें फिर से तन्हा मैं ख़ुद को पाऊँगा फिर भी वा'दा है तेरी यादों से चैन मुझ को न अब कहीं होगा जब तलक आ न जाएगी तू ख़ुद सिलसिला ख़त्म ये नहीं होगा अब मेरे पास तू नहीं रहती तेरी यादों ने घेर रक्खा है — SHIV SAFAR
“मैं मुसाफ़िर तेरा” मैं मुसाफ़िर तेरा तू है मेरा सफ़र आ चलें एक दूजे के संग उम्र भर थाम ले हाथ ऐसे न हो फिर जुदा चिट्ठियों से न होती है जैसे ख़बर कोई पूछे अगर मुझ सेे मंज़िल मेरी उॅंगलियों का इशारा हो तेरी तरफ़ कोई पूछे मेरी ज़िन्दगी है कहाँ धड़कनों का इशारा हो तेरी तरफ़ मेरी आँखों से देखो ये दुनिया हसीं तुझ में बन के रहूॅं मैं तेरी ही नज़र थाम ले हाथ ऐसे न हो फिर जुदा चिट्ठियों से न होती है जैसे ख़बर सोचता हूँ मैं ख़ुद को तेरा नाम दूँ क्यूँँॅंकि मुझ में है मेरा न बाक़ी ही कुछ हर किसी में मुझे तू नज़र आ रही नाम रख ले भले अपना कोई भी कुछ क्या पता कितनी है इस में सच्चाइयाँ लोग कहते हैं मुझ पे है तेरा असर थाम ले हाथ ऐसे न हो फिर जुदा चिट्ठियों से न होती है जैसे ख़बर जो कभी बात मुझ सेे भी करता न था अब तेरे ज़िक्र पर चुप ये रहता नहीं मेरे सीने में पत्थर सा था जो कभी अब मेरे पास इक पल ठहरता नहीं दिल मेरा छोड़ मुझ को निकल जाता है पीछे पीछे तेरे अब तू जाए जिधर थाम ले हाथ ऐसे न हो फिर जुदा चिट्ठियों से न होती है जैसे ख़बर — SHIV SAFAR
“रख हौसला” दिल की बस्ती में छाया है डर का समाँ छोड़ साँसें चलीं धड़कनों का मकाँ फिर भी कहती हैं उम्मीद की तितलियाँ मुस्कुराएगा फिर से ये अपना जहाँ बस तू रख हौसला बस तू रख हौसला दिन वो लौटेंगे फिर बस तू रख हौसला माना अपने घरों में सभी बंद है दिल की हर ख़्वाहिशों को ही ख़ुद मार के माना ये भी कि अब अपनी ये ज़िन्दगी दिल के कोने में बैठी है थक हार के फिर भी जीने की उम्मीद मत छोड़ना कर लो तुम अपने फिर हसरतों को जवाँ सुन ये कहती हैं उम्मीद की तितलियाँ मुस्कुराएगा फिर से ये अपना जहाँ बस तू रख हौसला बस तू रख हौसला दिन वो लौटेंगे फिर बस तू रख हौसला रात के बा'द होती है जैसे सहर मुश्किलों का अँधेरा भी छट जाएगा एक दूजे का ग़म जितना बाटेंगे हम उतनी जल्दी ही ये दिन भी कट जाएगा माना अपनों से ही डर है लगने लगा आँखों के सामने छा रहा है धुआँ फिर भी कहती हैं उम्मीद की तितलियाँ मुस्कुराएगा फिर से ये अपना जहाँ बस तू रख हौसला बस तू रख हौसला दिन वो लौटेंगे फिर बस तू रख हौसला — SHIV SAFAR
“अलविदा” मैं न यूँँ दर्द झेलता होता तू ने गर अलविदा कहा होता दर्द का सिलसिला जो अब तक है ख़त्म उस पल ही हो गया होता छोड़ कर जाने वाले तुझ को गर छोड़ कर मैं भी चल दिया होता मैं न यूँँ दर्द झेलता होता तू ने गर अलविदा कहा होता ख़ूब रोऊँगा मैं ने सोचा था तुझ से इक रोज़ जब जुदा हूँगा हक मगर वो भी तू ने छीना है जा तुझे ख़ूब बद-दुआ दूँगा तेरी यादों से मैं जुदा होता हिज्र के दिन अगर मिला होता मैं न यूँँ दर्द झेलता होता तू ने गर अलविदा कहा होता चाहते हो अगर तुझे भूलूँ और मैं दूँ न बद-दुआ तुझ को तो मुझे आके अलविदा कह दे मैं भी कर दूँगा फिर रिहा तुझ को मैं न यूँँ रोज़ मर रहा होता हिज्र का दिन अगर जिया होता मैं न यूँँ दर्द झेलता होता तू ने गर अलविदा कहा होता — SHIV SAFAR
“वो ही तुम हो” मेरी शा'इरी मेरे लफ़्ज़ों में गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो ये उजला सा पन्ना है चेहरा तुम्हारा ये नुक़्ता ये बिंदू है गहना तुम्हारा किताबों से आए तुम्हारी ही ख़ुशबू सुख़न में तुम्हीं से है लफ़्ज़ों का जादू ये मेरी क़लम उँगलियाँ हैं तुम्हारी बयाज़ों की दफ़्ती हैं बाहें तुम्हारी मेरे ज़िस्त के हर वरक़ में भी गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो ग़ज़ल है तुम्हारे बयाँ का तरीका ये बहरों ने सीखा है तुम सेे सलीक़ा सियाही है आँखों का काज़ल तुम्हारा ये मत्ला ये मक़्ता है आँचल तुम्हारा है मिसरा–ए–ऊला तुम्हारी जवानी तुम्हारे ही लब हैं ये मिस्रा–ए–सानी तख़ल्लुस में मेरे तलफ़्फ़ुज़ सा गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो — SHIV SAFAR