"घास"
मुझे नहीं बनना है कोई छायादार वृक्ष
न ही किसी सुगंधित और ख़ूब-सूरत फूल का पौधा
जिसे उखाड़ के फेंका जा सके
मुझे बनना है वो हरी और मुलाएम घास
तुम्हारे दिल की ज़मीन पर
जो मौसमों की मार से
हवा से धूप से जाड़े से गर्मी से और बारिश से
हर बार तुम में ही नष्ट हो और तुम में ही उगे
मुझे नहीं चाहिए तुम से कभी कभी मुलाक़ातों वाली
मौसमी सिंचाई
मुझे चाहिए तुम्हारे साथ की
ओस भरी बूँदें
जो हर सुब्ह मुझे और ज़्यादा तुम्हारा बनाए
हाँ मुझे बनना है तुम्हारे दिल की ज़मीन पर
वो हरी और मुलाएम घास
जो तुम्हारी
और सिर्फ़ तुम्हारी ही होकर रह जाए
— SHIV SAFAR















