haath apna jaate jaate kuchh yuñ jhuma raha tha | हाथ अपना जाते जाते कुछ यूँँ झुमा रहा था

  - SHIV SAFAR

हाथ अपना जाते जाते कुछ यूँँ झुमा रहा था
जैसे सदा की ख़ातिर वो दूर जा रहा था

होते ही सुब्ह मुझ सेे माँ पूछने लगी है
कल ख़्वाब में तू रो के किस को बुला रहा था

पहली दफ़ा वो अपने मिलने पे सोचता हूँ
क्या मुझको हो गया था क्यूँँ मुस्कुरा रहा था

हम दोनों के मुकम्मल मंसूबे हो न पाए
मैं प्यार कर रहा था वो आज़मा रहा था

मैं जानता हूँ तुमको तुम दूध के धुले हो
वो मैं था जो ख़ुद अपने दिल को दुखा रहा था

अब मान जाता हूँ मैं माज़ी को याद करके
वर्ना किसी से मैं भी बरसों ख़फ़ा रहा था

अब थक गया हूँ सच है लेकिन हाँ सच है ये भी
जी जान मैं लगा के उसको भुला रहा था

कुछ चार साल से ये सूरत है बद्दुआ सी
वर्ना किसी के दिल की मैं भी दुआ रहा था

कल शब मुशा'इरे में रोने लगा ‘सफ़र’ क्यूँँ
जो भी हो वजह हमको तो लुत्फ़ आ रहा था

  - SHIV SAFAR

Maa Shayari

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