उसी को आज कल मेरी ख़ुशी अच्छी नहीं लगती
जो कहता था कि आँखों में नमी अच्छी नहीं लगती
जले हाथों से माँ ने यूँँ ग़रीबी में खिलाए थे
कि अब रोटी में घी मक्खन लगी अच्छी नहीं लगती
मेरी इस ज़िंदगी से मेरा बिल्कुल ऐसा रिश्ता है
कि जिस सेे प्यार है मुझको वही अच्छी नहीं लगती
मैं अब जिसके भी आँखों में मुहब्बत देख लेता हूॅं
न जाने क्यूँँ मुझे वो फिर कभी अच्छी नहीं लगती
ज़मीं की एक लड़की ने मेरा दिल जबसे तोड़ा है
मुझे अब आसमानों की परी अच्छी नहीं लगती
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