क्या थी ज़रूरत पूरी कहानी कहने की
इश्क़ ही कह देते तो भी मैं रो देता
इश्क़ ही कह देते तो भी मैं रो देता
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मेरी और झुमके की क़िस्मत इक जैसी
उस ने हम दोनों को लटका रक्खा है
उस ने हम दोनों को लटका रक्खा है
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कभी पहले नहीं था जिस क़दर मजबूर हूँ मैं आज
नज़र आऊँ न ख़ुद क्या तुम से इतना दूर हूँ मैं आज
नज़र आऊँ न ख़ुद क्या तुम से इतना दूर हूँ मैं आज
तुम्हारे ज़ख़्म को ख़ाली नहीं जाने दिया मैं ने
तुम्हारी याद में ही चीख़ के मशहूर हूँ मैं आज
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जब रोजी रोटी कपड़ा और मकान गया
क्या इश्क़ की फ़ितरत होती है मैं जान गया
क्या इश्क़ की फ़ितरत होती है मैं जान गया
मैं सत्य अहिंसा के रस्ते पर निकला था
पहले तो आँखें फिर ज़बान फिर कान गया
बाक़ी क़ब्रों की मुझ से शिक़ायत जाएज़ थी
मरने के बा'द भी देर से क्यूँ शमशान गया
उस झुमके वाली का जब मैं ने नाम सुना
ख़ुद ग्राहक कैसे बिकते हैं ये जान गया
बस बीस रुपए थी क़ीमत उस के झुमके की
बिकते हैं आशिक़ सस्ते में मैं मान गया
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ज़िस्त की जान जाते भी देखा हूँ मैं
मौत को साँस आते भी देखा हूँ मैं
मौत को साँस आते भी देखा हूँ मैं
सब तो हँसते ही हैं मेरे हालात पे
दर्द को मुस्कुराते भी देखा हूँ मैं
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