जब रोजी रोटी कपड़ा और मकान गया
क्या इश्क़ की फ़ितरत होती है मैं जान गया
मैं सत्य अहिंसा के रस्ते पर निकला था
पहले तो आँखें फिर ज़बान फिर कान गया
बाक़ी क़ब्रों की मुझसे शिक़ायत जाएज़ थी
मरने के बाद भी देर से क्यूॅं शमशान गया
उस झुमके वाली का जब मैंने नाम सुना
ख़ुद ग्राहक कैसे बिकते हैं ये जान गया
बस बीस रुपए थी क़ीमत उसके झुमके की
बिकते हैं आशिक़ सस्ते में मैं मान गया
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