हर शाम बहती है ग़ज़ल ठंडी हवाओं की तरह
    आ बैठ कर मैं ज़ुल्फ़ तेरी क़ाफ़िए से बाँध दूँ
    Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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    क्यूँ आज है दुरुस्त लड़ाई पता करो
    क्यूँ फूल की दुकान हटाई पता करो

    ये पाँव मय-कदे कि तरफ़ बढ़ नहीं रहे
    किसने मिरी शराब छुड़ाई पता करो

    ऐसी अगन मची कि मिरे ख़्वाब जल गए
    कैसे हवा ने आग लगाई पता करो

    इक गांव के हकीम ये कह कह के मर गए
    कुछ इश्क़ का इलाज दवाई पता करो

    मैं भी सदीक़ शाइरों के बीच में रहा
    मेरी भी आदतें या बुराई पता करो
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    Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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    मिरी मौत और मिरी सज़ा के नए हिसाब बदल रहा
    या ख़ुदा सवाल के तर्ज़ पे ही सभी जवाब बदल रहा

    यहाँ देखिए मिरा ज़ो'म और हज़ार तख़्त की ताकतें
    वहाँ देखिए मिरा इक गुनाह सभी ख़िताब बदल रहा
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    Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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    पेशानी में ऐसी हरकत है अब क्यूँ
    फैली ख़ामोशी है दहशत है अब क्यूँ

    अपनी-अपनी साँसें रख कर समझाओ
    मुर्दों को लहदों से नफ़रत है अब क्यूँ

    मुझ को हैरानी है मरने पर मेरे
    दोज़ख़ में चर्चे हैं इज़्ज़त है अब क्यूँ

    तुम हाथों में आतिश लेकर चलते थे
    पानी से जलने की हसरत है अब क्यूँ

    मिल जाती है जिनको ग़म से आज़ादी
    फिर भी वो पूछेंगे ज़हमत है अब क्यूँ

    तय था सूरज को गर्दिश से खीचेंगे
    तरकीबों की भारी क़िल्लत है अब क्यूँ

    सर पे छत है तब भी क्या नाकाफ़ी है
    आख़िर दीवारों की क़ीमत है अब क्यूँ

    ऊँची आवाज़ों में भरते हैं हामी
    मैं भी सोचूँ सारे सहमत हैं अब क्यूँ

    किन ख़्वाबों में डूबे-डूबे रहते हैं
    तुझ में मुझ में सब में ग़फ़लत है अब क्यूँ

    कहता है 'तुम चौथी सफ़ में आ जाओ'
    रहबर को भी इतनी फ़ुर्सत है अब क्यूँ
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    Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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    मुझे है ख़बर सब के दम रुक रहे हैं
    कि दहलीज़ पर ही क़दम रुक रहे हैं

    किसी फ़ायदे पर सज़ा काट लूँ मैं
    सुना है तिरे भी सितम रुक रहे हैं

    मिरा ही मकाँ रौशनी से अलग क्यूँ
    कहीं तो ख़ुदा के करम रुक रहे हैं

    हवा तू बताना मुझे हाल घर का
    जहाँ भी दुबारा सनम रुक रहे हैं
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    Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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    मैं चाहूँगा ऐसा मंज़र दिख जाए
    तेरे मेरे सबके अंदर दिख जाए

    वो सब अपने होंगे तो भी डरना मत
    गर उन के हाथों में ख़ंजर दिख जाए

    मेरी नज़रों से देखो तो मुमकिन है
    ज़र्रे ज़र्रे में भी अंतर दिख जाए

    दिल के रेगिस्तां में बैठो कब कोई
    जादू-वादू ,जंतर-मंतर दिख जाए
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    Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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    रूमाल रख कि इन आँखों में नमी लगेगी
    हाँलाकि आज मेरी बातें सही लगेगी

    फिर नाम,रूतबा,दौलत या महल असासा
    चाहे जहाँ बना ले,माँ की कमी लगेगी

    तहसील दार अब खसरा क्यूँ दिखा रहे हैं?
    फिर से तिरी गली से मेरी गली लगेगी?

    अख़बार भर दिया लाशों की ख़बर बना कर
    यानी कलम लहू से लगभग सनी लगेगी

    कोई नया ख़ुदा मेरे इर्द गिर्द मत रख
    असली ख़ुदा की रहमत मुझ को नहीं लगेगी
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    Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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    हादसे इक रात गिनती में उठे
    और सब इक साथ गिनती में उठे

    या कि मैं ख़ामोश हो जाऊँ यहाँ
    या मिरी हर बात गिनती में उठे

    देख मेरी हल्फ़-बरदारी, ख़ुदा
    देख सारे हाथ गिनती में उठे

    ज़िंदगी शतरंज की बाज़ी चले
    और शह या मात गिनती में उठे

    बर्क़-अफ़्गन बन चुका वो आसमाँ
    काश सौ बरसात गिनती में उठे
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    Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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    ज़िंदगी की रज़ा बढ़ाते थे
    ख़ामख़ा ही सज़ा बढ़ाते थे

    लाश छू कर निकल गई साँसें
    मौत का भी मज़ा बढ़ाते थे
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    Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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    घरों में पुराने दरीचे मिलेंगे
    वहाँ से दिखे तो बगीचे मिलेंगे

    हवा का हवाला बताया गया है
    परिंदे सलाख़ों के पीछे मिलेंगे

    दुबारा गया था वही राह पर तू
    कहा था कि आगे गलीचे मिलेंगे

    सितारों की लाशें छुपाते रहे ना
    निगाहें कभी ये न भींचे मिलेंगे

    ख़ुदा ने बनाया सजाया जहाँ को
    बहाना बनाया कि नीचे मिलेंगे

    सुकूं ही इसी बात से है कि मेरे
    मिरे नाम पर तीर खींचे मिलेंगे
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    Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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