@Nikhil_tiwari
nikhil Tiwari shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in nikhil Tiwari's shayari and don't forget to save your favorite ones.
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बज़्म को दिल सौंप देंगे आप के कहने से पर
मसअला है नाम सब का क़ातिलों में दर्ज है
दिल के हर क़ाश में तारीक दिखाई देगा
फिर कहीं अस्ल में सब ठीक दिखाई देगा
अब ज़रूरत ही नहीं दूर चले जाने की
हर तमाशा तुझे नज़दीक दिखाई देगा
यहाँ से दूर इक दुनिया बनाता है
जहाँ पानी ही पानी को डुबाता है
चमकता शम्स तक हासिल नहीं उसको
बदन की रौशनी है दिल जलाता है
मेरे ख़ुदा तू और भी अज़रार दे मुझे
कुछ दिन हसीन ख़्वाब दे फ़िर मार दे मुझे
जो शोर उठ रहा है मिरे नाम का उधर
तो क्यूँ न हो कि बख़्त भी अक़्दार दे मुझे
हमारे ग़म का तमाशा बना रहे हो तुम
ख़ुदा करे ये अज़िय्यत तुम्हें भी ले डूबे
जा पूछ दरख़्तों से क्या गाँव बदलते हो
जब वक़्त बदलता है तुम छाँव बदलते हो
अब दिन ढले हैं दरिया तारीक लग रहा है
वो आख़िरी किनारा नज़दीक लग रहा है
जो हाल है कि तुझसे अब क्या कहें ख़ुदाया
कुछ ठीक तो नहीं है पर ठीक लग रहा है
साज़िशें हज़ार कर तू मौत से लड़ा मुझे
ऐ मिरे अज़ीज़ एक मर्तबा हरा मुझे
मुस्कुराते दिन के सुख से अब मुझे है क्या ग़रज़
तू उदास शाम की वो सिसकियाँ गिना मुझे
महबूब मुझसे कह रहा है चीखते रोते हुए
अब क्यूँ गले लगता नहीं तू सामने होते हुए
मेरे जनाज़े पर मुझे मैंने ही देखा है अभी
इतने दिनों के बाद गहरी नींद में सोते हुए
ये कि मेरा आसमाँ जो आ गया नज़र तुम्हें
बारिशें सिखा रही हैं इक नया हुनर तुम्हें
रहें जो भीड़ में भी दूर से पहचान जाती है
बिना बोले सुने बातें सभी की जान जाती है
ग़नीमत है कि रुतबे से गुमाँ नासाज़ है इसके
तभी तो बात ये लड़की हमारी मान जाती है
अजब सी रौशनी बिखरी थी दरिया के किनारों में
फ़लक ने चाँद पिघला कर उतारा आबशारों में
बताते हैं वो इक मंज़र किसी जादूगरी सा था
अमाँ दिल हार बैठे थे कई उस दिन नज़ारों में
हवाएँ आज इक ख़ुश्बू पुरानी सी उठा लाई
लगा जैसे हमारे गाँव की मिट्टी उठा लाई
ज़रा सी बात क्या कर दी यहाँ से दूर जाने की
जवानी चंद रिश्तों से बनी रस्सी उठा लाई
हुस्न की परतों के नीचे देख लेना ठीक से
ये बलाएँ क़त्ल करती हैं नई तकनीक से
फिर यक़ीं करना नहीं तुम आइनों की बात पर
काँच का टुकड़ा धँसेगा और भी नज़दीक से
ज़ुल्म के क़िस्से सुनाए जब कभी तफ़्सीर से
ख़ून धीरे से उतर आया मिरी तस्वीर से
मैं ज़मीं से यूँ लिपट कर रो नहीं सकता फ़क़त
आसमाँ ने बाँध रक्खा है मुझे ज़ंजीर से
जहाँ तक दरख़्शाँ उछाले गए
वहीं तक ही उनके उजाले गए
हमीं ने क़बाहत उठाई थी जब
फ़लक को ज़मीं के इज़ाले गए
अश्किया लोग थे नख़चीर उठा लाते थे
जाँ फ़ना करने को शमशीर उठा लाते थे
मैं परिंदों के क़फ़स तोड़ दिया करता था
ये लहू से सनी ज़ंजीर उठा लाते थे
यूँ तख़्त-गाह से रब का तबादला देखा
इसी बिना पे फ़रिश्तों में फ़ासला देखा