इक इश्क़ बाज़ को ये ज़माना सही लगा
हाँ ठीक है चलो ये बहाना सही लगा
वो जिस तरह से तीर चला कर गया अभी
उस सेे कहो कि आज निशाना सही लगा
आफ़ाक़ रौशनी से चकाचौंध हो सके
क्या इस सबब में दश्त जलाना सही लगा
मुझको ख़ुशामदी की ज़रा सी तलब नहीं
बस आजिज़ों में नाम कमाना सही लगा
जो आलम-ए-ख़याल हक़ीक़त समझ रहे
उनको ज़मीं की धूल दिखाना सही लगा
इस मय-कशी ने ख़त्म किया घूँट घूँट में
साक़ी तिरा भी वक़्त बचाना सही लगा
ये ज़िंदगी उधार में ही ख़र्च हो गई
अब बैठ के हिसाब मिलाना सही लगा
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