peshaani men aisi harkat hai ab kyun | पेशानी में ऐसी हरकत है अब क्यूँँ

  - Nikhil Tiwari 'Nazeel'

पेशानी में ऐसी हरकत है अब क्यूँँ
फैली ख़ामोशी है दहशत है अब क्यूँँ

अपनी-अपनी साँसें रख कर समझाओ
मुर्दों को लहदों से नफ़रत है अब क्यूँँ

मुझ को हैरानी है मरने पर मेरे
दोज़ख़ में चर्चे हैं इज़्ज़त है अब क्यूँँ

तुम हाथों में आतिश लेकर चलते थे
पानी से जलने की हसरत है अब क्यूँँ

मिल जाती है जिनको ग़म से आज़ादी
फिर भी वो पूछेंगे ज़हमत है अब क्यूँँ

तय था सूरज को गर्दिश से खीचेंगे
तरकीबों की भारी क़िल्लत है अब क्यूँँ

सर पे छत है तब भी क्या नाकाफ़ी है
आख़िर दीवारों की क़ीमत है अब क्यूँँ

ऊँची आवाज़ों में भरते हैं हामी
मैं भी सोचूँ सारे सहमत हैं अब क्यूँँ

किन ख़्वाबों में डूबे-डूबे रहते हैं
तुझ में मुझ में सब में ग़फ़लत है अब क्यूँँ

कहता है 'तुम चौथी सफ़ में आ जाओ'
रहबर को भी इतनी फ़ुर्सत है अब क्यूँँ

  - Nikhil Tiwari 'Nazeel'

Paani Shayari

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