Nadir Shahjahanpuri

@nadir-shahjahanpuri

Nadir Shahjahanpuri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Nadir Shahjahanpuri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जल बुझूँगा भड़क के दम भर में मैं हूँ गोया दिया दिवाली का — Nadir Shahjahanpuri

Ghazal

हम उन के ग़म में तड़प रहे हैं जो ग़ैर से दिल लगा चुके हैं हमारे दिल में है याद उन की जो हम को दिल से भुला चुके हैं बला-ए-महशर भी सहल उन को अज़ाब-ए-दोज़ख़ भी उन को आसाँ जो तेरी उल्फ़त में अपने दिल पर ग़म-ए-जुदाई उठा चुके हैं अदू से जा कर करो ये बातें वहीं गुज़ारो तुम अपनी रातें तुम्हारी बातों में आ चुके हम तुम्हें बहुत आज़मा चुके हैं अगर न आएँ नज़र न आएँ नहीं है कुछ भी ख़याल इस का कहाँ वो जाएँगे मुँह छुपा कर हमारे दिल में जब आ चुके हैं ये क्या क़यामत है या इलाही कि उन की आमद का हाल सुन कर शकेब-ओ-सब्र-ओ-क़रार होश-ओ-हवा से पहले ही जा चुके हैं ख़याल कुछ भी नहीं है तुझ को बुत-ए-परीवश हमारा हम तो तिरी मोहब्बत में नक़्द-ए-जान-ओ-दिल-ओ-जिगर भी लुटा चुके हैं बुतों को देना न भूल कर दिल न उन पे होना ज़रा भी माइल नहीं है जुज़ रंज उन से हासिल तुझे ये 'नादिर' जता चुके हैं — Nadir Shahjahanpuri
मिरे मिटने पे गर तू भी मिटा होता तो क्या होता तुझे भी सब्र ऐ दिल आ गया होता तो क्या होता चले आते हैं लाखों सरफ़रोशी की तमन्ना में तिरा कूचा अगर दारुश्शिफ़ा होता तो क्या होता अदम से मैं न आता इस जहाँ में ग़म उठाने को अगर हस्ती मुझे तेरा पता होता तो क्या होता तुझी पे मुंसिफ़ी है ले तू ही इंसाफ़ से कह दे अगर तेरी तरह मैं बे-वफ़ा होता तो क्या होता सितारे क्यूँँ दिखाती मुझ को दिन भर मेरी नाकामी वो शब को मल के अफ़्शाँ आ गया होता तो क्या होता सर-ए-शोरीदा को मैं पत्थरों से फोड़ता फिरता बुत-ए-काफ़िर जो तू मेरा ख़ुदा होता तो क्या होता सबात उस को नहीं फिर भी फ़िदा है हज़रत-ए-इंसाँ जो ये दार-ए-फ़ना दार-ए-बक़ा होता तो क्या होता किसी के पास रह कर भी तड़पते हिज्र में 'नादिर' हमें जन्नत में भी कुछ आसरा होता तो क्या होता — Nadir Shahjahanpuri
दिल मिट गया तो ख़ैर ज़रूरत नहीं रही हसरत ये रह गई है कि हसरत नहीं रही ये दिल बदल गया कि ज़माना बदल गया या तेरी आँख में वो मुरव्वत नहीं रही तेरी नज़र के साथ बदलता रहा है दिल दो रोज़ भी तो एक सी हालत नहीं रही तर-दामनी से हाथ न धो ऐ दिल-ए-हज़ीं क्या अब ख़ुदा की जोश पे रहमत नहीं रही देखेगा ख़्वाब में भी न वो सूरत-ए-सुकूँ जिस को ख़ुदा से चश्म-ए-इनायत नहीं रही उन की गली नहीं है न उन का हरीम है जन्नत भी मेरे वास्ते जन्नत नहीं रही किस शब तड़प तड़प के न काटी तमाम शब किस रोज़ मेरे घर पे क़यामत नहीं रही 'नादिर' न आए हर्फ़ तुम्हारी ज़बान पर वो शे'र क्या है जिस में फ़साहत नहीं रही — Nadir Shahjahanpuri
किए क़रार मगर बे-क़रार ही रक्खा हमें तो आप ने उम्मीद-वार ही रक्खा पस-ए-फ़ना भी फ़लक ने ग़ुबार ही रक्खा न रक्खी ख़ाक न संग-ए-मज़ार ही रक्खा किसी के दर्द-ए-जुदाई ने हम को जीते जी मिसाल-ए-अब्र-ए-सियह अश्क-बार ही रक्खा मैं तेग़-ए-यार का क्यूँँ कर न दम भरूँ जिस ने मज़े ख़लिश के दिए दिल-फ़िगार ही रक्खा मिला न चैन कभी हम को ख़ाक हो कर भी फ़लक ने दोश-ए-सबा पर सवार ही रक्खा ख़याल-ए-आरिज़-ए-रंगीं ने रोज़ आ आ कर ख़िज़ाँ में भी हमें महव-ए-बहार ही रक्खा किसी की चश्म-ए-मुकयफ़ ने किया कहीं 'नादिर' तमाम उम्र हमें बादा-ख़्वार ही रक्खा — Nadir Shahjahanpuri
ज़िंदगी अपनी कामयाब नहीं ग़म-ए-दौराँ का कुछ हिसाब नहीं दर्द जिस में न हो वो दिल कैसा नाज़ जिस में न हो शबाब नहीं मौज-ए-दरिया को चाहिए तेज़ी जो उठाए न सर हबाब नहीं दोस्त तेरी हरीम-ए-अक़्दस में एक बंदा ही बारयाब नहीं ख़्वाब-ए-मर्ग आएगा ज़रूर इक दिन ये हक़ीक़त है कोई ख़्वाब नहीं तेरे बाब-ए-क़ुबूल पर यारब अर्ज़ मेरी ही मुस्तजाब नहीं काम ये ला जवाब करते हो मेरे ख़त का कोई जवाब नहीं मेरे जुर्मों का कुछ हिसाब तो है तेरे ही रहम का हिसाब नहीं क्या करूँँ तेरी दीद की हसरत जब मुझे देखने की ताब नहीं देख गहरी नज़र से दरिया को कोई ऐसी खुली किताब नहीं तुझ से बेकस हैं सैकड़ों 'नादिर' ज़ेर-ए-गर्दूं तू ही ख़राब नहीं — Nadir Shahjahanpuri
लगता नहीं कहीं भी मिरा दिल तिरे बग़ैर दोनों जहाँ नहीं मिरे क़ाबिल तिरे बग़ैर कुछ लुत्फ़-ए-ज़िंदगी नहीं हासिल तिरे बग़ैर पल भर गुज़ारना भी है मुश्किल तिरे बग़ैर तू ही नहीं तो कौन करे मेरी रहबरी कटती नहीं हयात की मंज़िल तिरे बग़ैर दिल पर मिरे ही शाक़ नहीं है तिरा फ़िराक़ ख़ामोश हैं चमन में अनादिल तिरे बग़ैर फूलों के इबतिसाम पे आती है अब हँसी ऐसा बुझा हुआ है मिरा दिल तिरे बग़ैर होश-ओ-हवा से-ओ-अक़ल-ओ-ख़िरद दे गए जवाब या'नी नहीं हूँ मैं किसी क़ाबिल तिरे बग़ैर हर दम ये सोच है मिरे जीने से फ़ाएदा जब मक़्सद-ए-हयात है बातिल तिरे बग़ैर तकमील-ए-आरज़ू से है तकमील-ए-ज़िंदगी क्यूँँकर हो ज़िंदगी मिरी कामिल तिरे बग़ैर कश्ती निकल तो आई है गिर्दाब से मगर दिल डूबने लगा लब-ए-साहिल तिरे बग़ैर हर दम तड़प के लोटता फिरता हूँ ख़ाक पर गोया बना हूँ ताइर-ए-बिस्मिल तिरे बग़ैर आँखें ही पहले रोती थीं अब तो ये क़हर है रोने लगा है ख़ून मिरा दिल तिरे बग़ैर 'नादिर' को जान देने से क्यूँँ रोकता है तू जीने से भी है क्या उसे हासिल तिरे बग़ैर — Nadir Shahjahanpuri
कोई उस ज़ालिम को समझाता नहीं वो सितम करने से बाज़ आता नहीं दश्त-ए-ग़म में कब मिरा नक़्श-ए-क़दम हर क़दम पे आँख दिखलाता नहीं दर्द-ए-फ़ुर्क़त से ज़बाँ दाँतों में है क्या कहूँ कुछ भी कहा जाता नहीं चश्म-ए-दिल से देख उसे तू देख ले चश्म-ए-ज़ाहिर से नज़र आता नहीं सब्र-ए-शौक़-ए-वस्ल-ए-जानाँ क्या करूँँ पर लगा कर भी उड़ा जाता नहीं कब ख़याल-ए-ज़ुल्फ़ में हर रात को दिल पे मेरे साँप लहराता नहीं गुल से निस्बत किया तिरे रुख़्सार को ये तो वो गुल है जो कुम्हलाता नहीं दर्द-ए-फ़ुर्क़त से है अब होंटों पे दम फिर भी ज़ालिम को तरस आता नहीं जान ली है जल्वा-ए-रुख़सार ने क़ब्र की ज़ुल्मत से घबराता नहीं हुस्न की ख़ुद्दारियाँ तो देखिए बे-ख़ुदी में भी वो हाथ आता नहीं वो नहीं आते तो नादिर क्या गला होश जब दो दो दोपहर आता नहीं — Nadir Shahjahanpuri