हादसे इक रात गिनती में उठे
और सब इक साथ गिनती में उठे
या कि मैं ख़ामोश हो जाऊँ यहाँ
या मिरी हर बात गिनती में उठे
देख मेरी हल्फ़-बरदारी, ख़ुदा
देख सारे हाथ गिनती में उठे
ज़िंदगी शतरंज की बाज़ी चले
और शह या मात गिनती में उठे
बर्क़-अफ़्गन बन चुका वो आसमाँ
काश सौ बरसात गिनती में उठे
— Nikhil Tiwari 'Nazeel'















