“अलविदा”
मैं न यूँ दर्द झेलता होता
तू ने गर अलविदा कहा होता
दर्द का सिलसिला जो अब तक है
ख़त्म उस पल ही हो गया होता
छोड़ कर जाने वाले तुझ को गर
छोड़ कर मैं भी चल दिया होता
मैं न यूँ दर्द झेलता होता
तू ने गर अलविदा कहा होता
ख़ूब रोऊँगा मैं ने सोचा था
तुझ से इक रोज़ जब जुदा हूँगा
हक मगर वो भी तू ने छीना है
जा तुझे ख़ूब बद-दुआ दूँगा
तेरी यादों से मैं जुदा होता
हिज्र के दिन अगर मिला होता
मैं न यूँ दर्द झेलता होता
तू ने गर अलविदा कहा होता
चाहते हो अगर तुझे भूलूँ
और मैं दूँ न बद-दुआ तुझ को
तो मुझे आके अलविदा कह दे
मैं भी कर दूँगा फिर रिहा तुझ को
मैं न यूँ रोज़ मर रहा होता
हिज्र का दिन अगर जिया होता
मैं न यूँ दर्द झेलता होता
तू ने गर अलविदा कहा होता















