“पहली मुलाक़ात”

मैं पहली बार जब तुम से मिलूँगा
कहूँगा क्या मैं अक्सर सोचता हूँ

मिलूँगा मैं किसी अनजान जैसे
या फिर जन्मों की हो पहचान जैसे
मैं पहली बार जब देखूँगा तुम को
यक़ीं कैसे दिलाऊँगा मैं ख़ुद को
कि जिस के ख़्वाब अब तक देखता था
हक़ीक़त में वो मेरे सामने है
कहीं मैं सोचता ही रह न जाऊँ
कि रब ने की ये रहमत किस लिए है
वो पहली बार जब नज़रें मिलेंगी
मेरी आँखें ख़ुशी से झूम उठेंगी
वो पहला लफ़्ज़ क्या बोलूँगा तुम को
वो पहला तोहफ़ा मैं क्या दूँगा तुम को
वो पहली बार हाथों का पकड़ना
तुम्हें बाहों में पहली बार भरना
ये सब है वहम मेरा मानता हूँ
मेरा हक़ मैं बख़ूबी जानता हूँ
मैं फिर भी हक़ से बढ़कर सोचता हूँ
कहूँगा क्या मैं अक्सर सोचता हूँ
मैं पहली बार जब तुम से मिलूँगा

तुम्हें मिलने की दिल में आस ले के
ये मौसम सारे बीते जा रहे हैं
यक़ीं होगा न लेकिन वक़्त मुझ से
बड़ी मुश्किल से काटे जा रहे हैं
मगर तब तक मैं अपनी मुट्ठियों में
ये सारे मौसमों को भर रहा हूँ
तुम्हें मिल कर जो पहली चीज़ दूँगा
वो इक तैयार तोहफ़ा कर रहा हूँ
ये लू गर्मी की ये जाड़े की ठंडक
ये मंदिर के भजन ये जलते दीपक
हवाएँ सुब्ह की, बारिश की बूँदें
सुनहरी ओस ये सूरज की किरनें
सुहानी शाम, गंगा के किनारे
ये नीले आसमाँ के चाँद तारे
ये सावन और ये पतझड़ की रंगत
क्षितिज पर सात रंगों की ये संगत
सभी को भर के मन की चिट्ठियों में
मैं ले आऊँगा अपनी मुट्ठियों में
कहोगी तुम कि नामुमकिन है ये सब
ये लड़का इतना पागल हो गया कब
मैं ख़ुद भी सोचता हूँ सच कहूँ तो
कि इतना भी मैं क्यूँकर सोचता हूँ
कहूँगा क्या मैं अक्सर सोचता हूँ
मैं पहली बार जब तुम से मिलूँगा

— SHIV SAFAR

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