“मैं मुसाफ़िर तेरा”
मैं मुसाफ़िर तेरा तू है मेरा सफ़र
आ चलें एक दूजे के संग उम्र भर
थाम ले हाथ ऐसे न हो फिर जुदा
चिट्ठियों से न होती है जैसे ख़बर
कोई पूछे अगर मुझ से मंज़िल मेरी
उॅंगलियों का इशारा हो तेरी तरफ़
कोई पूछे मेरी ज़िन्दगी है कहाँ
धड़कनों का इशारा हो तेरी तरफ़
मेरी आँखों से देखो ये दुनिया हसीं
तुझ
में बन के रहूॅं मैं तेरी ही नज़र
थाम ले हाथ ऐसे न हो फिर जुदा
चिट्ठियों से न होती है जैसे ख़बर
सोचता हूँ मैं ख़ुद को तेरा नाम दूँ
क्यूँॅंकि मुझ
में है मेरा न बाक़ी ही कुछ
हर किसी में मुझे तू नज़र आ रही
नाम रख ले भले अपना कोई भी कुछ
क्या पता कितनी है इस
में सच्चाइयाँ
लोग कहते हैं मुझ पे है तेरा असर
थाम ले हाथ ऐसे न हो फिर जुदा
चिट्ठियों से न होती है जैसे ख़बर
जो कभी बात मुझ से भी करता न था
अब तेरे ज़िक्र पर चुप ये रहता नहीं
मेरे सीने में पत्थर सा था जो कभी
अब मेरे पास इक पल ठहरता नहीं
दिल मेरा छोड़ मुझ को निकल जाता है
पीछे पीछे तेरे अब तू जाए जिधर
थाम ले हाथ ऐसे न हो फिर जुदा
चिट्ठियों से न होती है जैसे ख़बर















