“ग़म का क्या करूँ”

बरसों पुराने ज़ख़्म पे मरहम का क्या करूँ
ये साल तो नया है मगर ग़म का क्या करूँ

या तो कोई नई सी दवा दो बता मुझे
या फिर नया सा ज़ख़्म ही कर दो अता मुझे

इस ज़िन्दगी को ख़त्म किया भी न जा रहा
ज़िंदा तो हूँ मगर यूँॅं जिया भी न जा रहा
अब और साँस मुझ से लिया भी न जा रहा
जीने का अब दिखावा किया भी न जा रहा

ऐसा करो कि पीछे छूट जाए ग़म मेरा
या फिर करो ऐसा की टूट जाए दम मेरा

इस बार मेरे दर्द को बरकत भी चाहिए
मशहूर हो सके इसे ज़िल्लत भी चाहिए
इस को दर–ओ–दीवार नया छत भी चाहिए
जर्जर ये हो गया है मरम्मत भी चाहिए

तुम शौक़ से मनाओ नए साल की ख़ुशी
मुझ को ये सोचने दो कि इस ग़म का क्या करूँ
बरसों पुराने ज़ख़्म पे मरहम का क्या करूँ
ये साल तो नया है मगर ग़म का क्या करूँ

— SHIV SAFAR

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