dahal jaata hai dil kyun aaine se | दहल जाता है दिल क्यूँँ आइने से

  - SHIV SAFAR

दहल जाता है दिल क्यूँँ आइने से
कभी पूछो किसी बहरूपिए से

हुआ इंसाफ़ गर इस फ़ैसले से
तो फिर क्यूँँ आह उट्ठी कटघरे से

किताबों से नहीं जो भूल जाऊँ
जो कुछ सीखा है सीखा तजरबे से

समंदर रोक पाएगा कहाँ तक
किसी टूटे हुए को डूबने से

निशाँ है प्यार का या सतवतों का
ये कैसी बू है आती मक़बरे से

अज़ीज़ों से मिला धोका तो जाना
खिसकती है ज़मीं पैरों तले से

हमेशा दौड़ कर मुमकिन नहीं है
कि मिलती भी है मंज़िल रेंगने से

शिकायत क्या करें अब फ़ासलों की
हमीं कहने गए थे तीसरे से

किसी के पाँव या लब तुम बताओ
ये रूखे होंठ हैं क्या चूमने से

सफ़र कोई नया थोड़ी है यारो
ये ग़म मुझ
में है सन चौरान्वे से

  - SHIV SAFAR

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