घर में बैठे बैठे अक्सर यूँँ ही नहीं मैं थकता हूँ
मन ही मन मीलों चलता हूँ मन ही मन कुछ बकता हूँ
उम्र-ए-सफ़र में नहीं हूँ तन्हा ख़ुद को ये समझाने को
पीछे मुड़ के अपने ही क़दमों के निशाँ को तकता हूँ
नज़रों के आगे अपनों की सूरत फिरने लगती है
वरना ग़म इतने हैं कि मैं अब ख़ुद से भी मर सकता हूँ
लोग करें अन-देखा पर ख़ुद मुझको ही दिख जाता है
चाहे जितनी ख़ूबी से मैं ख़ामी अपनी ढकता हूँ
सुनार मेरा जाने कब तक मुझको ज़ेवर में ढालेगा
कल भी आग में पकता था मैं आज भी आग में पकता हूँ
प्यार में हासिल क्या होता है मुझको मत बतलाओ तुम
दिल दुखने का डर है वरना मैं भी ये कर सकता हूँ
इतना भी बे-मिस्ल मुझे करने की ज़िद क्या थी या रब
बात भी कोई करता नहीं मैं ऐसा भी क्या यकता हूँ
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