रात से होकर शुरू थी ख़त्म होती रात में
याद है कुछ कितने दिन गुज़रे हैं अपनी बात में
अपने सीने में समंदर को लिए फिरते हैं हम
कह दो तूफ़ानों से रहना सीख लें औक़ात में
बिजलियों से डर के बाहों में सिमट जाते हो तुम
ठीक है फिर हम मिलेंगे मौसम-ए-बरसात में
इस दफ़ा हो जाओ तुम हम सेे जुदा लेकिन सुनो
फिर से आऊँगा जनम लेके तुम्हारी जात में
ख़ुद उड़ानी पड़ती है अपनी अना की धज्ज़ियाँ
भीख भी मिलती नहीं है अब यहाँ खैरात में
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