शक्ल नहीं मिलती है पर अब कुछ ऐसा कर जाऊँ मैं
ताकि अब अपने कर्म से पापा बिल्कुल तुझ पर जाऊँ मैं
माँ को तन्हा छोड़ आया था कुछ बनने की चाहत में
लेकिन अब इस सोच में हूँ क्या मुँह ले के घर जाऊँ मैं
कर ही क्या पाया मैं अब तक कुछ ग़ज़लें कहने के सिवा
कभी कभी तो जी करता है कुछ खा के मर जाऊँ मैं
ऐसा नहीं कि अपने घर की फ़िक्र नहीं मुझको लेकिन
सारी ज़िल्लत इस ख़ातिर है ताकि बड़ा कर जाऊँ मैं
सुना है तुझ से ठोकर खाकर लोग सँवरने लगते हैं
सोचता हूँ तेरे चौखट पर दिल अपना धर जाऊँ मैं
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