“वो ही तुम हो”
मेरी शा'इरी मेरे लफ़्ज़ों में गुम हो
जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो
ये उजला सा पन्ना है चेहरा तुम्हारा
ये नुक़्ता ये बिंदू है गहना तुम्हारा
किताबों से आए तुम्हारी ही ख़ुशबू
सुख़न में तुम्हीं से है लफ़्ज़ों का जादू
ये मेरी क़लम उँगलियाँ हैं तुम्हारी
बयाज़ों की दफ़्ती हैं बाहें तुम्हारी
मेरे ज़िस्त के हर वरक़ में भी गुम हो
जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो
ग़ज़ल है तुम्हारे बयाँ का तरीका
ये बहरों ने सीखा है तुम से सलीक़ा
सियाही है आँखों का काज़ल तुम्हारा
ये मत्ला ये मक़्ता है आँचल तुम्हारा
है मिसरा–ए–ऊला तुम्हारी जवानी
तुम्हारे ही लब हैं ये मिस्रा–ए–सानी
तख़ल्लुस में मेरे तलफ़्फ़ुज़ सा गुम हो
जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो















