इस लिए शब सो नहीं पाता हूँ मैं
दिन में खुल के रो नहीं पाता हूँ मैं
मिल ही जाता हूँ मैं ख़ुद को भीड़ में
चाह कर भी खो नहीं पाता हूँ मैं
ज़िंदगी के ग़म बहुत हल्के हैं दोस्त
ख़ुशियाँ हैं जो ढो नहीं पाता हूँ मैं
है पड़ी बंजर ख़यालों की ज़मीं
इस लिए कुछ बो नहीं पाता हूँ मैं
ख़ून धुल जाते हैं पर अश्कों के दाग़
लाख चाहूॅं धो नहीं पाता हूँ मैं
आख़िरश होता है क्या उस ख़्वाब का
देख कर भी जो नहीं पाता हूँ मैं
रोज़ उठ के ज़िक्र-ए-हक़ करता हूँ मैं
सिर्फ़ ज़िंदा हो नहीं पाता हूँ मैं
इस ‘सफ़र’ में मोड़ बन जाता है फिर
शख़्स वो जिस को नहीं पाता हूँ मैं















