“आख़िरी बात”
हमारे मिलने पे ख़ुश था प तेरी बात मुझे
चुभी है यूँ, कोई शायद कभी चुभी होगी
न जाने क्यूँ ही मगर तू ने कैसे बोल दिया
कि आज बात हमारी ये आख़िरी होगी
अगर तेरी है ख़ुशी इस
में तो यही होगा
पर अंत में जो कह रहा हूँ मैं वही होगा
कि.....
भले मैं ख़ुद न रहूँ तुझ से बोलने के लिए
भले तू सुनने को मौजूद हो न हो कल को
भले मैं ख़ुद ही किन्हीं मुश्किलों में उलझा रहूँ
भले न वक़्त तेरे पास ही हो इक पल को
भले ये आज से हालात कल रहें न रहें
भले ही कल को ये फ़ुर्सत के पल रहें न रहें
भले ज़माना हमें फिर कभी न मिलने दे
भले दिलों में हमारे न इश्क़ खिलने दे
भले ही कल को तेरे रास्ते हो जाएँ जुदा
भले मैं ख़ुद ही किसी और सफ़र पर चल दूँ
भले तू बात न करने का फ़ैसला कर ले
भले मैं ख़ुद भी ख़फ़ा रहने की क़सम ले लूँ
मगर ये बात मेरी याद हमेशा रखना
अगर हमारे जुनूँ में कमी नहीं होगी
तो आज अपनी मुलाक़ात आख़िरी हो मगर
हमारी बात कभी आख़िरी नहीं होगी















