ग़म को मेरे सौ गुना करते हैं टुकड़े काँच के

मैं ने यूँ दिल में सजा रक्खे हैं टुकड़े काँच के

आइने सी एक लड़की ख़्वाब में आती है जब
सुब्ह मेरी आँख से झड़ते हैं टुकड़े काँच के

जिन की मुझ से हैसियत आँखें मिलाने की न थी
पाँव के नीचे मेरे बन के हैं टुकड़े काँच के

लौट जाती हैं मेरी चौखट से ही तन्हाईयाँ
साथ कमरे में मेरे रहते हैं टुकड़े काँच के

फिर मुहब्बत गर हुई तो टूट कर मत चाहना
ख़ूँ के बदले दिल से बह सकते हैं टुकड़े काँच के

भूल बैठा हूँ कहीं पे लिख के नंबर अपनों का
पूछना था ये कि अब कैसे हैं टुकड़े काँच के

एक दिन होता है अपनी असलियत से सामना
लोग फिर ग़ुस्से में कर देते हैं टुकड़े काँच के

हँसने की ज़हमत न करना टूटने पर तुम मेरे
मुझ पे हँसने के लिए बैठे हैं टुकड़े काँच के

चल नहीं पाओगे मेरे साथ तुम ऐ गुल-बदन
इस ‘सफ़र’ में जा-ब-जा बिखरे हैं टुकड़े काँच के

— SHIV SAFAR

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