Khuddari Shayari - Poetic Verses Reflecting Self-Respect and Dignity

Discover an inspiring collection of Khuddari Shayari that beautifully captures the essence of self-respect, dignity, and pride. These poetic lines celebrate the strength of standing tall with integrity in the face of life’s challenges.

Best Khuddari Shayari on Self-Respect and Dignity

swabhiman shayari
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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तेरी ख़ता नहीं जो तू ग़ुस्से में आ गया
पैसे का ज़ो'म था तेरे लहजे में आ गया

सिक्का उछालकर के तेरे पास क्या बचा
तेरा ग़ुरूर तो मेरे काँसे में आ गया
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Mehshar Afridi
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उम्र जो बे-ख़ुदी में गुज़री है
बस वही आगही में गुज़री है
Gulzar Dehlvi
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बात हम दोनों को ही करनी है लेकिन
दोनों ही ख़ामोश हैं अपनी अना में

दर्द ग़म तकलीफ़ आँसू मिलते हैं बस
और कुछ भी तो नहीं मिलता वफ़ा में
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Amaan mirza
हर कोई कब पाने की चाहत करता है
पाने वाला ही अक्सर शिद्दत करता है

तुम उससे आज़ादी की बातें करते हो
जो ज़ंजीरों की काफ़ी इज़्ज़त करता है
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Ansar Etvi

Heart Touching Khuddari Shayari in Hindi

ghairat shayari
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
Nida Fazli
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सुन ओ कहानीकार कोई ऐसा रोल दे
ऐसे अदा करूं मेरी इज़्ज़त बनी रहे
Afzal Ali Afzal
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गर अदीबों को अना का रोग लग जाये तो फिर
गुल मोहब्बत के अदब की शाख़ पर खिलते नहीं
Afzal Ali Afzal
इनमें फ़क़त हवस है मुहब्बत न देंगे ये
इज़्ज़त तो लूट लेंगे ये इज़्ज़त न देंगे ये
Daqiiq Jabaali
ग़ैरत मुझे ख़ुद पे की मैं मज़े में हूँ
रंज उसे इसका की मैं खुश ही नहीं
Aryan Goswami

Emotional Khuddari Shayari on Pride and Strength

उधारी सर से ऊपर बढ़ चुकी है
हमारी जान जोखिम में पड़ी है

हमीं अपमान सहकर जी रहे हैं
अना की लाश पंखे पर मिली है
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Vikas Sahaj
मजबूरी में रक़ीब ही बनना पड़ा मुझे
महबूब रहके मेरी जो इज़्ज़त नहीं हुई
Sabahat Urooj
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बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'
कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है
Mirza Ghalib
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अपने दिल से अपनी हर अना को दूर तुम करो
दोस्त काम अब ये भी यूँ ही ज़रूर तुम करो
Shayar Danish
अना को अपनी कभी भी दगा नहीं दूँगा
मैं डूब जाऊँगा, तुझको सदा नहीं दूँगा
Qambar Naqvi

Beautiful Khuddari Shayari in Urdu

ग़ुरूर-ए-लुत्फ़-ए-साक़ी नश्शा-ए-बे-बाकी-ए-मस्ताँ
नम-ए-दामान-ए-इस्याँ है तरावत मौज-ए-कौसर की
Mirza Ghalib
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दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िंदगी
'अख़्तर' वो बे-ख़ुदी के ज़माने किधर गए
Akhtar Shirani
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अना को अपनी समझाना पड़ेगा
बुलाती है, तो फिर जाना पड़ेगा
Salman Zafar
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इज़्ज़त शान-ओ-शौकत ईगो छोड़ के तुम
गर मेरे हो जाओ कितना अच्छा हो
Ambar
हम को सलाम करता है तो जता जता कर
जो रोज़ ख़ूब पीता भी है छुपा छुपा कर

उस की अजीब फ़ितरत है राज़ खोलने की
जो राज़ पूछता है हम को हँसा हँसा कर

उस शख्स की अना उस को बस डुबा ही देगी
जो ज़हर बोलता है सब को ड़रा ड़रा कर

वो ज़ख़्म तो कभी भरते ही नहीं दवा से
जो ज़ख़्म बस दिए जाते हैं सुना सुना कर

हम तो गए थे अपना दुखड़ा उसे सुना ने
हम को थका दिया उस ने बस बिठा बिठा कर

इस बार ज़िन्दगी हम से रूठ ही न जाए
इस बार मौत ले जाएगी रुला रुला कर
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Meem Alif Shaz

Short Khuddari Shayari for Instagram Captions

ऐ "दाग़" बुरा मान ना तू उसके कहे का
माशूक की गाली से तो इज़्ज़त नहीं जाती
Dagh Dehlvi
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ज़ख़्म की इज़्ज़त करते हैं
देर से पट्टी खोलेंगे

चेहरा पढ़ने वाले चोर
गठरी थोड़ी खोलेंगे
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Khurram Afaq
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लड़ सको दुनिया से जज़्बों में वो शिद्दत चाहिए
इश्क़ करने के लिए इतनी तो हिम्मत चाहिए

कम से कम मैंने छुपा ली देख कर सिगरेट तुम्हें
और इस लड़के से तुमको कितनी इज़्ज़त चाहिए
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Nadeem Shaad
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साहब मेरे को इतनी तवज्जोह तो दीजिए
जो पीठ पीछे आप की इज़्ज़त भी कर सकूँ
shaan manral
फ़ितरत अगर हो काँच सी, दर-ओ-दीवार की
परदे हवा से कब तलक इज़्ज़त बचाएँगे
Aadil Sulaiman

Poetic Khuddari Shayari on Integrity and Courage

कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ
कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ

ख़ुदारा मुझ को तनहा छोड़ दीजे
मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ

सरासर आप हूँ मद्दे मुक़ाबिल
ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ

मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़तल
सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ

ये आलम है, कि अपने ही लहू में
सरासर डूब जाना चाहता हूँ

सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ

उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
वही मंज़र पुराना चाहता हूँ

नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ

चराग़ों को पयाम-ए-ख़ामुशी दे
तेरे नज़दीक आना चाहता हूँ
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Kazim Rizvi
बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआफ़
ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं न था
Bahadur Shah Zafar
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कम से कम मैंने छुपा ली देख कर सिगरेट तुम्हें
और इस लड़के से तुमको कितनी इज़्ज़त चाहिए
Nadeem Shaad
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कि मेरी बे-ख़ुदी का मत सबब पूछो
कि क्या है काफ़िरों को मत ये रब पूछो
Prince
किस ने काफ़िर बना दिया मुझको
नफ़्स धन इश्क़ हिर्स हुस्न अना
A R Sahil "Aleeg"

Khuddari Shayari on Standing Tall in Adversity

बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हम को
देर से इंतिज़ार है अपना
Meer Taqi Meer
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ज़िंदा रहने की ये तरक़ीब निकाली हमने
बात बिगड़ी हुई कुछ ऐसे सँभाली हमने

उससे समझौता किया है उसी की शर्तों पे
जान भी बच गई इज़्ज़त भी बचा ली हमने
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Divyansh Shukla
हम ने क़ुबूल कर लिया अपना हर एक जुर्म
अब आप भी तो अपनी अना छोड़ दीजिए
Harsh saxena
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उसको इज़्ज़त के ख़ौफ़ ने रोका
वरना वो भाग जाती मेरे साथ
Sayeed Khan
जिसे इज़्ज़त नहीं दिल की उसे यक़सर ज़ुदा कर दो
किसी को फूल देना है तो फिर उसको दिखा कर दो

परिंदे मर रहे हैं क़ैद में तुमको ख़बर है क्या
ज़रा उन पर तरस खाओ मेरी मानो रिहा कर दो
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"Nadeem khan' Kaavish"

Thoughtful Khuddari Shayari on Confidence and Self-Worth

चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ
हर पर्दा पर्दा नइँ होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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तुम्हें लगा है कि मेरे होते, तुम्हें भी दिल में जगह मिलेगी
बड़ी ही इज़्ज़त से कह रहा हूँ ,चलो उठो अब मेरी जगह से
Shadab Asghar
ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना था वो ख़्वाब में भी मिले
मैं नींद नींद को तरसा मगर नहीं सोया

ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल था कि थम गई बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म है कि मैं नहीं रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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निकलते ही ग़लत फ़हमी सभी हैरत में आएँगे
हो सूरज सामने जुगनू तभी ग़ैरत में आएँगे

~अंसार एटवी
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Ansar Etvi
चराग़-ए-अम्न को ज़ालिम न दे हवा वरना
तेरे गु़रूर की दस्तार जल भी सकती है
Wajid Husain Sahil

Inspirational Khuddari Shayari for Life’s Challenges

अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए
Ahmad Faraz
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ये नदी वर्ना तो कब की पार थी
मेरे रस्ते में अना दीवार थी

आप को क्या इल्म है इस बात का
ज़िंदगी मुश्किल नहीं दुश्वार थी

थीं कमानें दुश्मनों के हाथ में
और मेरे हाथ में तलवार थी

जल गए इक रोज़ सूरज से चराग़
रौशनी को रौशनी दरकार थी

आज दुनिया के लबों पर मुहर है
कल तलक हाँ साहब-ए-गुफ़्तार थी
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ARahman Ansari
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बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ
Rahat Indori
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बहुत ग़ुरूर था तुम को हसीन होने पर
हमें भी नाज़ कि तुमको भुला दिया हम ने
Meem Maroof Ashraf
जो सही नईं हुज़ूर करते हो
आप कितना ग़ुरूर करते हो
Sandeep Gandhi Nehal

Khuddari Shayari on Inner Strength and Resilience

मोहब्बत नेक-ओ-बद को सोचने दे ग़ैर-मुमकिन है
बढ़ी जब बे-ख़ुदी फिर कौन डरता है गुनाहों से
Arzoo Lakhnavi
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तू मोहब्बत नहीं समझती है
हम भी अपनी अना में जलते हैं

इस दफा बंदिशें ज़ियादा हैं
छोड़ अगले जनम में मिलते हैं
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Ritesh Rajwada
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हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ
आख़िर मिरे मिज़ाज में क्यूँ दख़्ल दे कोई
Jaun Elia
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मुझे मेरी तरह का चाहिए दुश्मन
अना के साथ समझौता न कर बैठे
Tiwari Jitendra
मेरी जाँ कोई ज़ुल्म न कर ख़ुदा के लिए
यहाँ कोई ग़ुरूर नहीं रहता सदा के लिए
SAFAR