Wajid Husain Sahil

Wajid Husain Sahil

@wajidhusain7861

Wajid Husain Sahil shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Wajid Husain Sahil's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

बस वही गुफ़्तुगू है इश्क़ जिसे आँख कहती है दिल समझता है — Wajid Husain Sahil
सब्र आने की देर है वरना तू भी दिल से उतर ही जाएगा — Wajid Husain Sahil
दिल मेरा लूट के कहते हैं वो भोले पन से हाल क्यूँ अपना दिवानों सा बना रक्खा है — Wajid Husain Sahil
दिल पे अपने ज़ख़्म का बस इक निशाँ रहने दिया आग तो मैं ने बुझा दी पर धुऑं रहने दिया — Wajid Husain Sahil
हाट इक रोज़ मेरे गाँव का आ कर देखो यहाॅं फ़्रीज़र नहीं मिट्टी के घड़े मिलते हैं — Wajid Husain Sahil
मेरी आमद से भला क्यूँ आइने डरने लगे मेरे हाथों में तो साहिल कोई पत्थर भी नहीं — Wajid Husain Sahil
वो फिर सताने लगे याद हम को आ कर के जिन्हें भुलाया था हम ने खु़दा- ख़ुदा कर के — Wajid Husain Sahil
उस ने माँगा नहीं कुछ और जुदाई के सिवा लेकिन अब उस को मैं इनकार नहीं कर सकता — Wajid Husain Sahil
मुझ से वो बोलता नहीं लेकिन मेरे बारे में बोलता है बहुत — Wajid Husain Sahil
आँखों की वॉल पर तेरी फ़ोटो की रौशनी बे-तौर चुभ रही थी सो मैं ने निकाल दी — Wajid Husain Sahil
वो हाथों से निकलते जा रहे हैं जिन्हें सर पे बिठाना चाहता हूँ — Wajid Husain Sahil
जो कह रहे हैं आप वो कर क्यूँँ नहीं जाते जीने से शिकायत है तो मर क्यूँँ नहीं जाते — Wajid Husain Sahil
वो शख़्स जो नज़रों से बहुत दूर है लेकिन पहरो उसे तकता हूँ मैं ख़्वाबों में बुला कर — Wajid Husain Sahil
अपनी आँखों का इंतिख़ाब पढ़ूँ नींद आए तो कोई ख़्वाब पढ़ूँ — Wajid Husain Sahil
इसी लिए मुझे ननिहाल हश्र लगता है वहाँ भी माँ की बदौलत पुकारा जाता हूँ — Wajid Husain Sahil
नया कुछ कर दिखाने का इरादा टूट जाता है किसी बच्चे के हाथों जब खिलौना टूट जाता है — Wajid Husain Sahil
तेरे मेरे मिलन का ख़्वाब नाज़ुक आइने सा है लगे आवाज़ का पत्थर तो सपना टूट जाता है — Wajid Husain Sahil

Ghazal

नया कुछ कर दिखाने का इरादा टूट जाता है किसी बच्चे के हाथों जब खिलौना टूट जाता है तहम्मुल ऐन वाज़िब है मुहब्बत की शरीअत में अगर इफ़्तार जल्दी हो तो रोज़ा टूट जाता है तिरे मेरे मिलन का ख़्वाब नाज़ुक आइने सा है लगे आवाज़ का पत्थर तो सपना टूट जाता है कहाँ ठोकर समझती है किसी बूढ़े की लाचारी वो जब लाठी बचाता है तो चश्मा टूट जाता है हक़ीक़त ज़िंदगी की पूछता हूँ जब भी गुलशन से तो फौरन पेड़ की टहनी से पत्ता टूट जाता है तुझे यकसर भुलाने का तुझे दिल से मिटाने का इरादा जब भी करता हूँ इरादा टूट जाता है ये इक बेटी समझती है के उस का घर बसाने को मेरा बूढ़ा पिदर अंदर से कितना टूट जाता है ज़माने भर में मत तू घूम ले कर ज़ौम की चाबी ज़रा नरमी से नफ़रत का ये ताला टूट जाता है जवाँ बेटे का लाशा बाप जब कोई उठाता है भले फौलाद का हो फिर भी काँधा टूट जाता है — Wajid Husain Sahil
चाह पाने की नहीं खोने का कुछ डर भी नहीं ग़म जुदाई का मुझे रत्ती बराबर भी नहीं नीम और बरगद नहीं सड़के हैं पीपर भी नहीं फिर कहाॅं जाऍं परिंदों के कोई घर भी नहीं जब से उस का हो गया फिर मैं कहाॅं बाक़ी रहा लोग बाहर ढूँढ़ते हैं मैं तो अंदर भी नहीं जी मैं आता है उसे बंदी बना लूॅं ख़्वाब में पर मिरी आँखों में तो रुकता वो पल भर भी नहीं शोहरतें इंसान को पंछी बना देती हैं क्या वो भी उड़ते हैं हवा में जिन के तो पर भी नहीं जीते जी तमग़ों से शायद कुछ भला होता मगर क्या करें दस्तार का जब जिस्म पे सर भी नहीं किस क़दर इस दौर की रंगीनियों में खो गए हम को अब अस्लाफ़ के पैग़ाम अज़बर भी नहीं अब हरम की पासबानी आप ख़ुद ही कीजिए अब अबाबीलो के लश्कर और कंकर भी नहीं हाल क्या बतलाऊॅं मैं दिल के लुटे ऐवान का "इतना वीराँ तो मज़ारों का मुक़द्दर भी नहीं" मेरी आमद से भला क्यूँ आइने डरने लगे मेरे हाथों में तो साहिल कोई पत्थर भी नहीं — Wajid Husain Sahil
वक़्त-ए-फ़ुर्सत जो किताबों में सफ़र करता हूँ मैं तख़य्युल के सहाबों में सफ़र करता हूँ जब भी उन मस्त निगाहों में सफ़र करता हूँ ऐसा लगता है शराबों में सफ़र करता हूँ रू-ब-रू आ के तो खो देता हूँ खु़द पर क़ाबू इस लिए मैं तिरे ख़्वाबों में सफ़र करता हूँ बारहा रुख़ से हटाते हुए जु़ल्फ़-ए-जानाँसह्र-अंगेज़ हिजाबों में सफ़र करता हूँ खु़द से ही छेड़ दिया करता हूँ बातें तेरी और फिर खु़द ही इक़ाबों में सफ़र करता हूँ बे-शऊरी की सनद है तेरा चुभता लहजा मैं तो शाइ'र हूँ गुलाबों में सफ़र करता हूँ कहीं मजनूँ कहीं राँझा कहीं 'साहिल' बनकर मैं मुहब्बत के निसाबों में सफ़र करता हूँ — Wajid Husain Sahil
गर तेरा दर खुला नहीं होता फिर कोई आसरा नहीं होता तब भी कश्ती ख़ुदा चलाता है जब कोई ना-खु़दा नहीं होता बीच का कोई रास्ता ही नहीं प्यार होता है या नहीं होता दिल से कहता हूँ मैं, मिरा हो जा पर वो कहता है जा, नहीं होता अक़्ल ये बार-बार कहती है दिल किसी का सगा नहीं होता मत कहीं ढूँढ़ जा के खु़शहाली माँ के क़दमों में क्या नहीं होता आओ उल्फ़त जहान में बाँटें नफ़रतों से भला नहीं होता मर के भी मुल्क की वफा़ओं का क़र्ज़ हम सेे अदा नहीं होता नर्म लहजे में बात करने से काम दुनिया में क्या नहीं होता फिर नवाफ़िल का ज़िक्र क्या 'साहिल' फ़र्ज़ तुझ सेे अदा नहीं होता — Wajid Husain Sahil
खु़शामद कर के याँ लाया गया हूँ मगर महफ़िल से उठवाया गया हूँ अचानक छोड़ कर यूँँ बज़्मे-जानाँ नहीं आया, मगर लाया गया हूँ फ़रिश्ता हूँ न कोई पारसा हूँ मैं आदम हूँ जो बहकाया गया हूँ मैं हूँ इक ख़्वाब पर इतना बता दे तिरी आँखों में क्यूँँ पाया गया हूँ दिखा कर चाँद में चेहरा तुम्हारा किसी बच्चे सा बहलाया गया हूँ मुसलसल हिचकियाँ आने लगी हैं तो क्या मैं याद फ़रमाया गया हूँ मुसाफ़िर था, सरा-ए-दिल में तेरे फ़क़त कुछ दिन ही तो आया गया हूँ तवक़्को़ यूँँ तो उन सेे कुछ नहीं थी भरोसा दे के भरमाया गया हूँ विसाले यार है 'साहिल' क़ज़ा तो मलाइक भेज बुलवाया गया हूँ — Wajid Husain Sahil

Nazm

“बिटिया” घर में ख़ुशी बनकर आई थी रूप परी का धर आई थी दिल की तमन्ना बर आई थी बिटिया मेरी जब घर आई थी पहली दफा़ जब उस को उठाया वो एहसास में लिख नहीं पाया आँख ख़ुशी से भर आई थी बिटिया मेरी जब घर आई थी झूले में जब-जब रोती थी गोद में आ कर चुप होती थी उस में शरारत भर आई थी बिटिया मेरी जब घर आई थी ख़ुशियों की सौगा़त है वो तो सुनती मेरी हर बात है वो तो ले के हसीं मंज़र आई थी बिटिया मेरी जब घर आई थी उस सेे ही रौशन घर है मेरा वो ही दिया है, वो ही सवेरा शम्सो-क़मर बनकर आई थी बिटिया मेरी जब घर आई थी मेरी सुब्ह है शाम वही है राहते-दिल, आराम वही है वो रहमत बनकर आई थी बिटिया मेरी जब घर आई थी — Wajid Husain Sahil