वो फिर सताने लगे याद हम को आ कर के
जिन्हें भुलाया था हमने खु़दा- खु़दा कर के
दिल के एहसास को क्यूँ हाजत-ए-गोयाई हो
इश्क़ सादिक़ हो तो इज़हार का मोहताज नहीं
मैंने बरसों इसी उम्मीद पे काटीं 'साहिल'
उन लबों से कभी इज़हार भी हो सकता है
पाने को तुझको मैंने तहज्जुद भी की अदा
तू मिल गई तो फ़र्ज़ भी बैठा हूँ छोड़ कर
एक मुद्दत की रियाज़त का सिला है 'साहिल'
मेरे अश'आर जो लोगों की ज़बाँ तक पहुँचे
कभी चल कर रुके होंगे, कभी रुक कर चले होंगे
अदा-ए-ख़ुश-ख़िरामी में वो जाने कब ढले होंगे
सियाही बे-सबब आँखों के साहिल पर नहीं आती
यक़ीनन चश्मे-आतिश में कई आशिक़ जले होंगे