मैं ने 'अकबर' से कई रंग भरे थे लेकिन
ये ग़ज़ल 'जौन' की तस्वीर हुई जाती है
ये ग़ज़ल 'जौन' की तस्वीर हुई जाती है
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मैं इस लिए भी तिरे वस्ल से झिझकता हूँ
कहीं फिर इश्क़ मेरा रायगाँ न हो जाए
कहीं फिर इश्क़ मेरा रायगाँ न हो जाए
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मैं ने बरसों इसी उम्मीद पे काटीं 'साहिल'
उन लबों से कभी इज़हार भी हो सकता है
उन लबों से कभी इज़हार भी हो सकता है
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पाने को तुझ को मैं ने तहज्जुद भी की अदा
तू मिल गई तो फ़र्ज़ भी बैठा हूँ छोड़ कर
तू मिल गई तो फ़र्ज़ भी बैठा हूँ छोड़ कर
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कभी चल कर रुके होंगे, कभी रुक कर चले होंगे
अदा-ए-ख़ुश-ख़िरामी में वो जाने कब ढले होंगे
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मशहूर कितना हो गया हूँ इश्क़ में तिरे
गूगल पे लिख के नाम मिरा देख तो सही
गूगल पे लिख के नाम मिरा देख तो सही
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