वो फिर सताने लगे याद हम को आ कर के
    जिन्हें भुलाया था हमने खु़दा- खु़दा कर के

    Wajid Husain Sahil
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    कैसी अब सालगिरह कैसी बधाई लोगों
    वो जो बिछड़ा तो मेरी उम्र घटा दी उसने

    Wajid Husain Sahil
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    मैंने 'अकबर' से कई रंग भरे थे लेकिन
    ये ग़ज़ल 'जौन' की तस्वीर हुई जाती है

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    मैं इसलिए भी तिरे वस्ल से झिझकता हूँ
    कहीं फिर इश्क़ मेरा रायगाँ न हो जाए

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    दिल के एहसास को क्यूँ हाजत-ए-गोयाई हो
    इश्क़ सादिक़ हो तो इज़हार का मोहताज नहीं

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    मैंने बरसों इसी उम्मीद पे काटीं 'साहिल'
    उन लबों से कभी इज़हार भी हो सकता है

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    पाने को तुझको मैंने तहज्जुद भी की अदा
    तू मिल गई तो फ़र्ज़ भी बैठा हूँ छोड़ कर

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    एक मुद्दत की रियाज़त का सिला है 'साहिल'
    मेरे अश'आर जो लोगों की ज़बाँ तक पहुँचे

    Wajid Husain Sahil
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    कभी चल कर रुके होंगे, कभी रुक कर चले होंगे
    अदा-ए-ख़ुश-ख़िरामी में वो जाने कब ढले होंगे

    सियाही बे-सबब आँखों के साहिल पर नहीं आती
    यक़ीनन चश्मे-आतिश में कई आशिक़ जले होंगे

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    मशहूर कितना हो गया हूँ इश्क़ में तिरे
    गूगल पे लिख के नाम मिरा देख तो सही

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