Amaan mirza

Amaan mirza

@Mirzaji

Amaan mirza shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Amaan mirza's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कुछ उस का हूँ कुछ इस का कुछ हूँ बाक़ी दरमियाँ तेरा हो जाउँगा बस तू मोहब्बत पूरी कर — Amaan mirza
मौत इक अर्श है ये ज़िंदगी है एक सुतून और सुतून ऐसा जिसे काट रहे हैं हम लोग — Amaan mirza
कुछ ऐसे करता है वो मुझ सेे बात आहिस्ता आहिस्ता के मालो ज़र की बढ़ती हो ज़कात आहिस्ता आहिस्ता — Amaan mirza
खा गया इश्क़ मौज मस्ती के दिन यार लानत है इस जवानी पे — Amaan mirza
आदतें सारी छोड़ दी मैं ने तुम तो मुझ को सुधार कर गई हो — Amaan mirza
अपनी जाँ की हिफाज़त भी ख़ुद करते हैं अब फ़क़ीरों को सदक़ा नहीं देते लोग — Amaan mirza
हालत को मेरी देख के हँसते तो हो लेकिन हालात समझने में बहुत देर लगेगी — Amaan mirza
बड़ी मुश्क़िल से मियाँ मिलती है इक आसानी लोग आसान समझ लेते हैं आसानी को — Amaan mirza
नहीं आसान इंसाँ हो के हर इक की ख़बर रखना बहुत सारे तअल्लुक़ टूट जाते हैं तग़ाफुल में — Amaan mirza
ये आज कल नए लौंडे हमारे शे'रों में कमी टटोलते हैं उस पे काम करते नहीं — Amaan mirza
मुझ सेे मेरी जाँ कर रही हो तर्क-ए-त'अल्लुक़ तुम को कोई और मिल गया या ऊब चुकी हो — Amaan mirza
ये सच है मुझ को दिखते नहीं तेरे ऐब-ओ-ख़म दिखने लगी हैं ख़ूबियाँ तू है मुझे पसंद — Amaan mirza
हँस के मिलते हो और दिल में बुग़्ज़ रखते हो क्या ये सूरत नहीं है दोस्त दोगलेपन की — Amaan mirza

Ghazal

कुछ नौजवाँ निकल पड़े पैदल अँधेरे में जाने किधर को जाएँगे पागल अँधेरे में थोड़ी सी दूर चलते ही चीख़ें सुनाई दीं अक्सर ख़मोश रहते हैं जंगल अँधेरे में कल फिर किसी के लम्स का एहसास हो गया कल फिर दिखाई दी मुझे हलचल अँधेरे में मैं ने जब आँखें बंद कीं तो तू दिखा मुझे आँखें खुलीं तो हो गया ओझल अँधेरे में कुछ दिन के वक़्त चोट मुझे आँधियों ने दी और उस पे फिर बरस पड़े बादल अँधेरे में उस की तमन्ना थी मैं किसी ग़ार में मरूँ रहता हूँ इस लिए मैं मुसलसल अँधेरे में हालत को मेरी देख के हैरत न कर अज़ीज़ आ मेरे साथ चार क़दम चल अँधेरे में — Amaan mirza
कुछ इतना ख़ास नहीं पर तलाश कर रही है ये आँख कौन सा मंज़र तलाश कर रही है यहाँ बग़ैर सुबूतों के मिलता नइँ इंसाफ सो लाश ख़ुद में ही ख़ंजर तलाश कर रही है मशक्क़तों से परेशानियों से तंग आ कर थकान रस्तों पे बिस्तर तलाश कर रही है हमें सुकूँ के सिवा इस सुख़न ने कुछ न दिया मगर ये नस्ल यहाँ ज़र तलाश कर रही है और उस को दे दिया मैं ने तुम्हारे घर का पता फ़लाँ की लड़की है वो वर तलाश कर रही है वो उठ के क्या गए महफ़िल से रौनक़ें भी गईं उदासी चार सू अब घर तलाश कर रही है जहाज़ उड़ा रहे है बेटे और इक बेटी उड़ान भरने को अंबर तलाश कर रही है भटक रही है जो सहरा में कै़स की मानिंद ये रूह प्यासी है दिलबर तलाश कर रही है सभी ने अपने लिए इस का इस्तिमाल किया हुक़ूमत अब नया दावर तलाश कर रही है अज़ीज़ मेरा भी दम घुट रहा है मलबे में के रूह अब नया पैकर तलाश कर रही है मज़े मज़े में मेरे हाथ लग गई शमशीर गुनाहगारों का जो सर तलाश कर रही है — Amaan mirza
मज़ा बहुत है जलने में किसी के साथ साथ दिए की उम्र घटती है प रौशनी के साथ साथ बिछड़ते वक़्त दिख रहे थे अश्क आँखों में छुपा रहा था जिन को वो हँसी के साथ साथ रुख़ उस के बा'द मौसमों ने भी बदल लिया चली गईं बहारें भी उसी के साथ साथ घर एक दश्त है जहाँ हैं ग़म की बारिशें मैं सब्ज़ हो रहा हूँ इस नमी के साथ साथ सफ़र तवील है न मंज़िलें क़रीब हैं सो पुल बना रहा हूँ इक नदी के साथ साथ नहीं समझ सकेगा कोई भी मेरा कलाम बस अक़्लमंदो पर खुलेगा फ़ी के साथ साथ तुम्हें भी मुझ में ख़ामियाँ दिखाई दीं अज़ीज़ कुछ अच्छी आदतें भी थीं बुरी के साथ साथ हम ऐसे लोग क्या कहेंगे शे'र और सुख़न हुनर से ख़ाली हैं अज़ीज़ ज़ी के साथ साथ अज़ीज़ ज़ीस्त से फ़क़त तुम्हें गिला नहीं ये ज़िंदगी तो है हर अजनबी के साथ साथ — Amaan mirza
आँख में जलते हुए ख़्वाब की ता'बीर बनूँ बन नहीं सकता मगर चाहता हूँ नीर बनूँ बा'द मरने के मैं शैतान कहा जाऊँगा हाँ मगर मेरी भी ख़्वाहिश नहीं मैं पीर बनूँ दिल से आसाँ है क़बीलों पे फतह करना सनम इस लिए मैं ने भी सोचा है जहाँगीर बनूँ किस तरह दूँ मैं तुम्हें अपनी वफाओं का सुबूत किस तरह दोस्त मुहब्बत में मैं तनवीर बनूँ तेरे हाथों की लकीरों से निकाला गया हूँ जाने अब किस के मुक़द्दर की मैं तक़दीर बनूँ ये कहानी मैं ज़ुबानी सुना सकता हूँ मगर तुम अगर देखना चाहो तो मैं तस्वीर बनूँ काम मुश्किल है बहुत अच्छा सुख़न-वर होना ठीक तो ये है मैं मिर्ज़ा रहूँ क्यूँँ मीर बनूँ — Amaan mirza
मैं क्या बताऊँ कैसी थी यारों मेरी पसंद चेहरे से साँवली थी वो और सादगी पसंद उस का न हो सका मैं वो मेरा न हो सका ये और बात मिलती थी हम दोनों की पसंद हम दोनों में बस एक यही बात थी अलग मुझ को था इश्क़ और उसे दोस्ती पसंद फिर उस के आगे है महे ताबाँ की क्या बिसात चेहरे में इतना नूर के आ जाएगी पसंद होने लगीं थीं मुझ को अँधेरों से वहशतें जुगनू को देखा तो आ गई रौशनी पसंद मेरी तो बात क्या मेरी कुछ भी ख़ता नहीं अच्छा हूँ या बुरा हूँ मैं हूँ तो तेरी पसंद पहले पहल जो करते थे मिर्ज़ा का बॉयकॉट करने लगे हैं वो भी मेरी शा'इरी पसंद — Amaan mirza
पहले पहल तो इश्क़ ने उस पर किया असर फिर धीरे धीरे मुझ पे भी होने लगा असर मदहोश जो हुआ न कभी पी के ख़ुम के ख़ुम दो चार प्यालों का भला उस पर हो क्या असर दिल की न सुनने से सदा दिलबर की सुनने पर पड़ता है आदमी पे फिर इस का बुरा असर होगी भी हम को क्यूँँ भला कल से कोई ग़रज़ मेहनत से कुछ हुआ न करेगी दुआ असर दौलत गई तो बे सर ओ सामान हो गए लेकिन नवाबी रह गई और रह गया असर ले दे के एक ग़म ही बचा है हमारे पास ये और बात कह दो इसे प्यार का असर कोई मेरे गुमाँ का तसव्वुर न कर सके मेरी निगाह का पड़े इतना बुरा असर उन के उसूल मुझ को दिलो जाँ से हैं अज़ीज़ वालिद की सब नसीहतों ने कर दिया असर ये जिस्म तो है आदमी का मुश्त ए उस्तुख़्वाँ बाक़ी जो दिख रहा है वो है रूह का असर ता उम्र हम को ज़ीनत ए दुनिया दिखी नहीं हालाँकि हमपे दुनिया का दिखता रहा असर दोहरा रहा हूँ ख़ुद को मैं लम्हात की तरह होने लगा है मुझ पे भी तारीख़ का असर — Amaan mirza
कर दूँ सब तुझ पे ख़र्च इतनी दौलत नहीं है बे फ़िज़ूली की मुझ को भी आदत नहीं है अब किसी को भी मुझ सेे मुहब्बत नहीं है अब मुझे भी किसी से शिकायत नहीं है अब किसी पर नहीं कर सकेंगे भरोसा दिल धड़कता है लेकिन सलामत नहीं है कटघरे में खड़े हैं वो सर को उठा कर जिन को अपने किए पर नदामत नहीं है बात हक़ की कहें गर तो बाग़ी हैं हम लोग आप दंगे करें तो बग़ावत नहीं है बाक़ी सब कुछ मेरे पास है उस के जितना लेकिन उस के बराबर जहालत नहीं है थी गई गुज़री जो बेच कर खा गए आप आप की आँखों में कोई ग़ैरत नहीं है मेरे दिल पर है उस की हुकूमत मगर अब उस के दिल पर मेरी बादशाहत नहीं है हम चले जाएँगे दूर नज़रों से तेरी तू बस इक बार कह दे मुहब्बत नहीं है मिल गया है मुझे मौत का सारा सामान अब किसी चीज़ की मुझ को हाजत नहीं है — Amaan mirza