शुरू में लगती है अच्छी जिसे बुरी आदत

फिर उस को ख़ाक बना देती है वही आदत

शराब पीना बुरी बात है मैं जानता हूँ
प क्या करें मुझे भी अब तो लग गई आदत

कमा के खाने से मेहनत से तुम को क्या मतलब
तुम्हें तो लग चुकी है अब हराम की आदत

किसी के साथ अगर मैं भी हँस लिया तो क्या
है नागवार मुझे तेरी भी कई आदत

ये सच है मैं बुरी आदत से करता हूँ परहेज़
मगर ये भी नहीं है मैं ने छोड़ दी आदत

— Amaan mirza

More by Amaan mirza

Other ghazal from the same pen

See all from Amaan mirza →

Sach Shayari

Shers of sach.

All Sach Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling