किसी की हो नहीं सकती हैं सिर्फ़ मेरी हैं
ये मेरे हुजरे में तन्हाइयाँ जो फैली हैं
यहीं कहीं पे हो तुम मैं तुम्हारे पास में हूँ
हमारे दरमियाँ अब दूरियाँ ये कैसी हैं
हैं देखने को नज़ारे कई हसीन यहाँ
मगर सभी की निगाहें तुझी पे ठहरी हैं
फिर आज याद तुम्हारी हमें रुला के गई
तुम्हारी यादें भी बिल्कुल तुम्हारे जैसी हैं
किसी नए की हो जाती हैं फिर पुराने के बाद
मोहब्बतें ये ज़माने की जाने कैसी हैं
हर एक आह को हमने छुपाए रक्खा है
ख़मोश रहते हैं लब और आँखें बहती हैं
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